थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत १९ अगहन २६४६, सोम्मार ]
[ वि.सं १९ मंसिर २०७९, सोमबार ]
[ 05 Dec 2022, Monday ]

प्रकृति पूजा ‘गुरही’

पहुरा | १० श्रावण २०७७, शनिबार
प्रकृति पूजा  ‘गुरही’

भूमिका

संस्कृति हरेक समुदायके अपन मौलिक पहिचान हो । कौनोफे जातिके जातीय पहिचान कला, संस्कृति ओ भाषासंग जोरल रहठ । थारू समुदायमे फे यैसिन ढेर संस्कृति रहल बाटै । जौन अब्बे प्रायः लोप हुइना अवस्थामे बाटै । समय, काल ओ ऋतु अनुसार थारू समुदायमे ढेर चाड पर्व मनैठै । जौन मध्ये थारू समुदायके एक महत्वपूर्ण पर्व हो ‘गुरही’ । यी पर्व विशेषतः पश्चिमा थारूहुक्रे मनैना करठै । कैलाली जिल्लाके थारुहुक्रे विगत १० वर्षसे धनगढीमे यी पर्व संस्थागतरुपसे मनैटी अइटी बाटै । गुरही पर्वहेफे संस्थागत हुई नइडेना विगतके कुछ वर्ष आघे टमान चलखेल हुइल । गैर थारुहुकनके भित्तेपात्रोमे समेत अन्यौलके स्थिति सिर्जना हुइल हमारठेन यथार्थ बा  ।

का हो गुरही ?

‘गुरही’ थारू समुदायके एक पर्व हो । यिहीहे ढेर जे महामारी भगैना पर्वके रूपमे फे लेठै । यी पर्व सावन महिनाके शुक्लापक्षके पञ्चमीके दिन परठ । यिहे दिन हिन्दुहुक्रे नामपञ्चमी मनैठै कलेसे थारु समुदायमे ‘गुरही’ । जौन कारण नागपञ्चमी ओ गुरही एक्के हो कना ढेरके बुझाई फे बा । मने यी संयोग केल हो वास्तविकता नइहो । थारू समुदायके ‘गुरही’ पर्वके अपने सामाजिक मूल्य ओ मान्यता बा कलेसे नागपञ्चमीके अपने ।

थारू समुदाय प्रकृति पुजक अथवा प्राकृति धर्म समूह भिटरके एक जाति हो । अइने प्रकृतिप्रति विश्वास कैना समुदाय हु्इट । मिश्रित बसाईके कारण एक दुसरके धर्म, आस्था ओ संस्कृतिप्रति सद्भाव तथा समान व्यवहारके कारण और समुदायके सांस्कृतिक प्रभाव कतिपय संस्कृति थारू समुदायके लाग मौलिक हुसेकल बा । जस्टे रक्षाबन्धन, भाईटीका आदि…।

‘गुरही’ पर्व एक गुरही नाउँके किरा (गाईने) संग जोरल बा । गुरही एक मेरिक उरना किरा हुइट । अइने मच्छर, भुस्ना लगायत छोट किराहुकनहे खैना करठै । अइनके संरक्षणसे मच्छर (लामखुट्टे) ओ भुस्ना लगायत किराहुकनके कमी हुके रोगव्याधी महामारी गाउँमे प्रवेश नइहुइना वैज्ञानिक धारणा बा । यिहे किराहुकनके पूजासे धानमे लग्ना किरा फट्ङिगा, लुटो, खटरा जैसिन महामारी रोग व्याधी कम हुइना जनविश्वास थारू समुदायमे बा ।

कैसिक मनाजाइठ गुरही पर्व ?

शुक्लापक्षके चौठा दिन गाँउके चौकीदर गाउँमे हाँक परठै । ‘घुघरी भिजाउ रेउ घुघरी भिजाऊ’ । गाउँमे सक्कुहुनके घरेम चना, केराउके घुघरी (कोहरी, चानक वा केराउके एक विशेष प्रकारके परिकार) भिजैठै । दुसर दिन पञ्चमीके दिन साँझ चना वा केराउ पकैठै । यहोर चौकीदार फेर हाँक परठै । ‘गुरही अस्राई चालो रेउ, गुरही अस्राई ।’ हाँक पारलपाछे गाउँके सक्कु घरेक कुवाँरी लउण्डी कपडाके टुक्रासे बनाइल गुरहीके प्रतीकके रूपमे गुडिया, चनाके घुघरी (चनाके एक विशेष परिकार) चना नइहुइलेसे केराउ अथवा मकै (घुघरी) ओ लउण्डा सोँटा (कोंर्रा) लेके थारु पहिरनमे सजके गाउँके दक्षिण चोकमे जमा हुइठै ।

अस्रैना बेला लैजा, महामारी जैसिन रोग सक्कु लैजा, रोगव्याधी सक्कु लैजा कहटी गुरहीसंगे रोगव्याधी पठाई अइठै ।

अइसिक हुइल गुरही पर्व संस्थागत

थारु समुदायमे मजा–मजा कला संस्कृति बाटै । जौन संस्कृति अन्जान व्यक्ति एक चो हेरलेसे मख्ख परठै । थारु समुदायमे टमान खाले नाँच बाटै जस्टे सखिया, मुग्रहुवा, झुम्रा, मघौटा, दिननचुवा आदी । मने पछिल्का अवस्थामे यी सक्कु नाँचहे लोप कैना उदेश्यसे यी या उ नाउँमे हस्तक्षेप हुइटी रहल बा । थारु समुदायके कला संस्कृति केवल थारुहुकनके केल नइहुके हम्रे सक्कु नेपालीहुकनके हो कना उदेश्यसे १० वर्ष आघे थारु पत्रकार संघके पहलमे थारुसंग सम्बन्धित संघसंस्थाके अगुवाईमे धनगढीमे गुरही मनैना सुरु कैगिल ।

पहिले–पहिले थारु गाउँमे केल गुरही पर्व मनाइट मने विगत १० वर्ष यहोरसे धनगढीमेफे छिटकके बैठल थारुहुक्रे संयूक्तरुपसे गुरही मनाई लागल बाटै । जौन पर्व अब्ब्े आके संस्थागत हुसेकल बा ।

थारु समुदायसे गाउँ–गाउँमे मनैटी आइल चाड पर्वहे संस्थागत कैना पछिल्का कुछ वर्ष यहोर धनगढीमे सामुहिकरुपसे गुरही, चिरै भजहर, अष्टिम्की, अँट्वारी, माघ, हरेरी पुजा लगायत पर्व भव्यरुपसे मनैटी रहल बाटै । यी पर्व मनैटी करेबेर हरेक वर्ष थारु सम्बद्ध संघसंस्था, थारु अगुवा, बुद्धिजीवि, नागरिक समाज, सखी सञ्जाल, थारु पत्रकारहुकनके महत्वपूर्ण योगदान बा ।

पहिले–पहिले चाड पर्व लग्गे अइटी रहेबेर हरेक वर्ष कुछ थारु अगुवाहुकनके टीमसे राज्यहे ध्यानाकर्षण कराई पर्ना अवस्था रहे । सरकारसे विस्तारे सम्बोधन करटी रहल आभास हुइटा । काहेकी थारु समुदायके संस्कृति समग्र नेपालके संस्कृति हो । ओ राज्य वफादारी हुई परल । थारु संस्कृतिफे राज्यके सम्पत्ति भिटर परठ । यिहे संस्कृति हेर्न बाह्रय पर्यटक ललायत बाटै । राज्य यिहीहे ढिलो चाँडो व्यवस्थित करे परठ । पछिल्का कुछ वर्ष यहोर स्थानीय सरकारसे थारु समुदायके कला संस्कृतिके संरक्षण ओ सम्बद्र्धनके लाग कुछ रकम विनियोजनफे माग करटी रहल बा ।

गुरही चोकके नमाकरण:

धनगढी बजारके भूमि थारु समुदायसे आर्जल जमिन हो । विगत लम्मा समयसे धनगढीमे बसोबास रहल थारु समुदायके लउण्डा लउण्डी क्याम्पस चोकमे गुरही कार्यक्रम मनैटी आइल ओरसे थारुहुकनके ढेर जैसिन कार्यक्रम क्याम्पस चोकमे हुइना करल रहठ । थरुहट आन्दोलन हुईबेर थरुहट आन्दोलनकारीहुकनके जमघट हुइना ठाउँ क्याम्पस चोक रहे कलेसे अखण्ड सुदूरपश्चि आन्दोलनकारीहुकनके जमघट हुइना ठाउँ एलएन चोक रहे । यैसिक आन्दोलनसे फे क्याम्पस चोक थारु समुदायके कौनोफे नाउँ डेके नामाकरण करे पर्ना निश्कर्ष निकारल रहे ।

टीकापुर घटनापाछे पहिल गुरही पर्व २०७३ मनैना क्रममे तत्कालिन कैलाली प्रमुख जिल्ला अधिकारी गोविन्द रिजालके वडका पहुनामे क्यापस चोकहे ‘गुरही चोक’ कहिके विधिवत तरिकासे नामाकरण कैगिल रहे । मने हालसम्म यहाँके प्रशासनिक निकाय, स्थानीय सरकार भर गुरही चोकहे मनसे अस्वीकार करल अवस्था बा । मने थारु अगुवा बुद्धिजीवि भर वरसौ वर्षसे उहे चोकमे गुरही मनैटी आइल कारण उ चोकहे गुरही चोकके नामाकरण डेसेकल बा ।

यी वर्ष कैसिक मनैना गुरही

यी वर्ष सामाजिक दूरी कायम करके गुरही पर्व मनैना सखी सञ्जाल कैलालीसे सक्कुहुनमे अनुरोध करले बा । विश्वभर महामारीके रुपमे फैलल कोरोना भाइरस (कोभिड–१९) के भयाभह अवस्थाहे मध्यनजर करटी सखी संजालसे यी वर्ष सामाजिक दूरी कायम करके, भिड्भाड नइकरके आ अपने गाउँ घरके चोक चोकमे मनैना विज्ञप्ती मार्फत अनुरोध करले बा ।

सखी सञ्जाल लगायत टमान संघ संस्थाके बैठकसे ‘अपने बाँची ओ औरहेफे बचाउ,’ ‘सुरक्षित ओ स्वस्थ रही’ कना भाव सहित सुरक्षित ढंगसे गुरही मनैना सक्कुहुनमे अनुरोध करल हो । गुरही अस्राई अइना जिहीफे मास्क अनिवार्य हुई पर्ना, भिडभाड नइकैना, सामाजिक दुरी कायम करके गुरही मनैना योजना बनैले बा ।

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