थारु राष्ट्रिय दैनिक
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[ 15 Aug 2022, Monday ]

फुर्सदमे ‘हरचाली’, फाइदै फाइदा !

पहुरा | २४ श्रावण २०७७, शनिबार
फुर्सदमे ‘हरचाली’, फाइदै फाइदा !

धनगढी, २४ सावन । धान लगैना ओराइलपाछे कैलालीके कैलारी गाउँपालिका ६ बेनौलीके विपति थरुनी (६०) डेलुवा सजैनामे लागल बाटी । जवान नातिनियाक् भोजक् दिन लग्गे अइटी रहल बेला सगुनके रुपमे डेहेक् लाग उहाँ डेलुवा सजैनामे जुटल हुइटी । उहाँ किल नाई, उहाँके पटोहिया वनस्पति थरुनी फेन भात भान्साक् काम ओरैटी किल गोंरी बिन्नामे लागजिठी आजकाल ।

‘धान लगैना ओराइलपाछे हम्रे फुर्सदमे रहठी । ओहे फुर्सदके समयहे सगेना लगैटी घरयसी प्रयोगमे अइना चीज बनैठी’, वनस्पति कहली–‘घर बाहिर जाउँ कलेसे, कोरोना सोरोना रोग लाग्न कहठै । यहिसे घरहीमे हरचाली कर्ना मजा लागठ ।’

जैविक सामग्रीके प्रयोग करके कलात्मक ढंगसे बनाजिना डेलुवा पश्चिम नेपालके थारु जातिमे प्रायः भोजकाज, औपचारिक कार्यक्रममे सजावती तथा सौन्दर्य सामग्रीके रुपमे प्रयोग हुइटी आइल बा । कलेसे ढकियाके प्रयोग सामान ढर्ना ओ बोकक् लाग प्रयोग करजाइठ । जौन बनाइक् लाग सीप संगे दक्षता ओत्रही जरुरी रहना बटागिल बा ।

कोरोना कहरसे ग्रामीण भेग फेन अछुतो नैहो । संक्रमण समुदाय स्तरमे फैलटी गैलपाछे मनोवैज्ञानिक त्रास ओस्टही बा । ग्रामीण भेगके लौव पुस्ता फेन परम्परागत सीपसे फेन लौव सीप ओ प्रविधि सिख्न ओहोर बाटै । कलेसे कुछ लौव पुस्ता विना कामे आजकाल हुइलेसे फेन बुढापाका भर पुर्खौली ज्ञान, सीपके सदुपयोग करटी त्रास भुलैना प्रयासमे बाटै ।

आजकाल ग्रामीण भेगके जन्नी मनै ढकिया, डेलुवा, पनछोप्नी लगायत घरायसी प्रयोगमे अइना चीज बनैनामे लागल बाटै । पुस्तौसे प्रचलनमे रहल ज्ञान ओ सीपके सदुपयोग करटी उहाँहुक्रे टमान उपकरण बनैनामे लागल हुइट । टरटिहुवार लच्क्याइलपाछे टिहुवारमे चाहना चीज जोर्नासे फेन एकओहोर समयके सदुपयोग ओ डोसरओहोर घराहीमे रहेक पर्ना हुइलओरसे महामारीके संक्रमणसे बचे सेकजिना कैलारी गाउँपालिकाका ६ के वडा सदस्य महावीर चौधरी बटैठै ।

बेनौलीके सुझावन डंगौरा थारु (६५) आजकाल ढह्रिया बनाके फुर्सदके समय सगेना लगैटी आइल बाटै । मच्छी मर्र्ना उदेश्यसे ढह्रिया बनैटी आइल उहाँ याहोरओहोर जाके जोखिम सहनासे फेन घरमे बैठके हरचाली कर्ना ओ साँझ्याके कुलुवामे ढह्रिया लगैनाहे बहुट निक मन्ठै ।
सुझावन कहठै–‘पुुरान ज्ञान सीपके फाइदै फाइदा बा । ढह्रियामे रोजदिन मच्छी बाझजिना हुइलओरसे रोजदिन मच्छीक् टीना रहठ हमार । ढिउर रहल दिन पक्ली (सिद्रा) बनैठी । टरटिहुवामे यहे पक्ली विशेष परिकारके रुपमे रही ।’

थारु जातिमे ढह्रिया बनैना हस्तकला प्रविधि पुस्तौसे चल्टी आइल बहुट मौलिक प्रविधि हो ।
आजकाल फुर्सदके समयमे ग्रामीण वस्तीमे ढह्रिया किल नाई, टापी, जाल, बरेरुवालगायत मच्छी मर्र्ना प्रविधिके साथे खटिया, सुप्पा, छिट्नी, छिटुवा, गोरुभैंस बाँधेक् लाग प्रयोग कर्ना पगाहा, छर्की, बेना लगायत बनैना काम हुइटी आइल डेखजाइठ ।

घरायसी प्रयोजनमे अइना यी चीच फुर्सदके समयमे बनैलेसे फेन प्रयोगभर बाह्रौंमास करजाइठ । जौन वातावरणीय हिसाब ओ आयआर्जनके हिसाबसे फेन महत्वपूर्ण रहल बटाजाइठ ।
मने पछिल्का समय उ प्रविधि तथा बनैना ज्ञान ओ सीप ढिरेसे लोप हुइटी गैल बा । समय अनुसार लौव पुस्तामे हस्तान्तरण हुई नैसेकलपाछे उ हस्तकला सम्बन्धी ज्ञान ओ सीप लोप हुइटी गैल थारु संस्कृति विद अशोक थारु बटैठै ।

टमान दृष्टिकोणसे वैज्ञानिक, किफायती रहल उ सामग्री बनैना ज्ञान ओ सीपमे व्यवसायिकता नाने सेक्लेसे संरक्षण करे सेकजिना संस्कृति विद थारु औल्याइठै ।

‘आजकाल बिल्गाइल महामारीके बीचमे हरचाली करल कहलेसे फेन थारु जातिमे फुर्सदके समय सगेना लगैटी उपयोगी उपकरण बनैना काम पुस्तौसे चल्टी आइल बा । जौन वैज्ञानिक बा । वातावरणमैत्री बा । आयआर्जन करेसेकजिना सम्भावनायुक्त बा । ओहेकमारे व्यावसायिकताके माध्यमसे पुस्तान्तरण करे सेक्लेसे संरक्षण फेन हुइना रहे । राज्यके निकाय फेन ओइसिन ज्ञान ओ सीपके प्रवद्र्धन कर्ना जरुरी बा’, संस्कृति विद थारु कहठै ।

शब्द/चित्र लखन चौधरी

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