थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत २८ सावन २६४६, शनिच्चर ]
[ वि.सं २८ श्रावण २०७९, शनिबार ]
[ 13 Aug 2022, Saturday ]

थारु मानक भाषा बहससे सिखाई

पहुरा | २९ भाद्र २०७७, सोमबार
थारु मानक भाषा बहससे सिखाई

थारु मानक भाषम् अब्बे बहस जारी बा । बहस पहिलेहीं हुइना रहे, मने बहुट डिन पाछे हुइटा । पाछे हुइलेसे फे यी बहुट मजा बात हो । मै कौनो भाषा बिशेषज्ञ नाइहुँ, टबु फे भासा बहस मिहिन घिंरह्याडारल । पर्हना, लिख्ना, छलफलमे भाग लेना बानिक कारणफे हुई मिहिन बहसमे भाग लेना मजा लागठ । ठोरचे जानकारी रख्लेसे फे अब्बेक जारी भाषा बहसमे यिहाँ परोस्ले मजा रही कना मिहिन लागठ ।

मानक भाषम् औपचारिक बहस ‘थारु साहित्य सम्मेलन २०७३’ से शुरु हुइल कि कनाहस् लागठ । टब ओकर नाउँ ‘थारु साहित्यिक म्याला २०७३’ रहे । म्याला अब्बे सम्मेलनके रुपम बा । यिहे सम्मेलन हमरन बहसमे भिराडेले बा हमार फे अपन मानक भाषा बने कहना चाहना जगाडेले बाओ चिन्तित बनाडेलेबा । हमरे चिन्तित यी कारण हुइल बाटी कि हमरे बुझ्ली, मातृ भाषा हमार पहिचान हो, अन्तरमनके आवाज हो, सम्बादके पहिल करी हो, जेकर बेल्साइसे एक मनै, डोसर मनैक भावना, इच्छा बुझ्ठैं । भाषम् अटरा शक्तिरहठ कि मनैनमे खुशी, जोश टुरुन्ट लाने सेकठ । देशमे रही या विदेशमे, अपन मातृ भाषामे बात सुन्बो टो बहुट खुशी लागठ । अपन बुझ्ना भाषामे कोई कहडी टो छणभरमे शरीर हलुक लागे लागठ, रोंवा ठार्ह होजाइठ, जोश आजाइठ, लग्गे लागे लागठ । कबो मनहे अटरा जोरसे टटोलडेहठ कि आँश आइलागठ । यी भाषक कमाल हो ।

भाषक इतिहास हेर्बो टो नेपालमे २०१७ सालसे पहिलेहिन्दी भाषामे परहाई होए । तराईके ढेर भूभागमे हिन्दी भाषा अटरा प्रभाव पारल की पूर्बी तराईमे हिन्दी भाषा जनमनमे बैठगिल । उहे कारण टमाम मधेशी समुदाय अभिन फे हिन्दी भाषाहे अपन मातृ भाषा कहठैं, सम्पर्क भाषा कहठैं । मैथिली, भोजपुरी भाषा सम्पर्क भाषा बने नाइसेकल । भाषासे पर्ना प्रभावके मूल्यांकन करके हुई सायड २०१७ सालमे राजा महेन्द्र हिन्दी भाषम् डैजिना शिक्षाहे रोक लगैटी नेपाली भाषम् शिक्षा डेहना शुरु करडेहल । सरकारके कदमके कारण कोई चाहे या नाचाहे, नेपाली भाषा परही पर्ना होगिल ।

२०१७ सालसे लागू हुइल नेपाली भाषा आज भारी छलांग मारसेकल । आज हमरे अपन मानक भाषक बहसमे पुरुबके थारु पच्छिउँक थारुनसे नेपालीम् बोलेक परटा । मधेशीनके सम्पर्क भाषा हिन्दी बनेहस् हमार सम्पर्क भाषा नेपाली बने पुगल बा । यडिहिन्दी भाषामे परहाई हुइलकरट टो नेपाली भाषक अटरा हाली बिकास सम्भव नाइरहे । यडि सरकार, राज्य नाइलागट तो जनस्तरसे नेपाली भाषा हाल्हल मानक भाषा बनेसेक्ना सम्भव नाइरहे । राज्यसे लेहनाकदम ओ जनस्तरसे लेहना कदममे यिहे फरब बा । राज्यके कदम बाध्यकारी रहठ कलेसे जनस्तरसे लेहनाकदम स्वैच्छिक रहठ । हमार मानक भाषक कदम स्वैच्छिक हो । स्वैच्छिक कदममे सर्वसहमति वा ढेर सहमतिक आवश्यकता परठ । हमरनसे लैजिना एक्सनमे ठोरचे यिहे समस्या बिल्गाइठ ।

अभिन फे हमार सरकारके जोर नेपाली भाषम् किल बा । बिबिधता देशके धन हो, यिहिन बचैना चाही कनामे सरकारके ध्यान नाइहो । अभिन फे संबिधानमे लिखगिल बा कि “नेपालमे बोल जिना सक्कु मातृ भाषा राष्ट्र भाषा हो, देवनागरी लिपिमे लिख जिना नेपाली भाषा सरकारी कामकाजके भाषा रही । नेपालीबाहेक बहुसंख्यक मनैनसे बोल जिना एक वा दुई भाषाहे प्रदेश सरकार सरकारी कामकाजके भाषा तोकेसेकी”। संविधानमे रहल यी ब्यबस्था ओ सरकारके ब्यबहारसे प्रष्ट बा कि आउर भाषा सरकारी कामकाजके भाषा नाइबनेसेकहीं । संबिधानमे यी ब्यबस्था बा, मने देशके कुछ गाउँपालिका, नगरपालिका स्थानिय मातृ भाषामे कामकाज कर्ना निर्णय कर्ले बाटैकना बात समाचारमे आइल हो । उ फे लिखित नाई कि मौखिक । मौखिकके लग अटरा माथापच्छी काकरे कर्ना? हमरन बोल्ना कहाँ? के रोक्ले बा ? हाँ मने उ नगरपालिका, गाउँपालिका थारु भाषामे निबेदन लिख्वाइटा, निबेदन स्वीकार करटा, निर्णय लिखेबेर थारु भाषम लिखटा कलेसे हो मानेसेकजाई कि कुछ प्रगति हुइटा । नि टो बालुम पानी डारेहस किल हो ।

का हो मानक भाषा ?

आजकाल्ह मानक भाषम् बहस जारी बा । मोर बुझाइमे मानक भाषा कलेक उ समृद्ध भासा हो, जौन गाउँ घरेम बोल्ना बोली, भाषिकासे उप्पर रहठ, जिहिका ढेर से ढेर मनै बेल्से सेक्ठैं । जौन भासामे एकरुपता रहठ, लिखेबेर ब्याकरण वा नियमहे माने परठ, जौन भाषा बोलेबेर अपनत्व वा स्वायत्तता महशुश हुइठ, जौन भाषामे चिठी, पत्र, सरकारी कागज लिखे सेकजाइठ, जौन भाषा एक जिल्लासे डोसर जिल्ला, एक क्षेत्रसे डोसर क्षेत्रके मनैनबिचमे सम्पर्कके माध्यमके रुपमे काम करठ । मानक भाषाबिना मनै एकडोसरसे सम्पर्क नाइकरेसेक्ठैं । मनके बात खुलके ढरे नाइसेक्ठैं । मानक भाषामे टरे उल्लेख हुइल अनुसार गुण रहठ ।

मानक भाषामे रहना गुण:

कहठैं मानक भाषामे यी गुण रहठ:

१. ब्याकरण अनुसार चल्ना

मानक भाषा सकहुनसे मानगिल भाषा हो वा बहुसंख्यक मनैनके सहमती जनाइल भाषा हो । टबेमारे यी भाषिका (कोचिला, सप्तरीया, चितवनिया, डंगौरा, देशौरिया, रझटिया, कठरिया आदि भाषिका) से उप्पर रहठ । यिहीहे बोलेक लग ब्याकरणके आवश्यकता परठ । ब्याकरण सर्वसहमतीसे नाइबनटसम् भाषक बिकास नाइहुइठ । टबेमारे हमरे बुझे परल कि मानक भाषा ब्याकरण अनुसार किल चलेसेकठ ।

२. सकहुनसे स्वीकारजिना

मानक भाषा सकहुनसे स्वीकारजिना भाषा हो । बिनास्वीकारोक्ति भाषा आगे बर्हे नाइसेकठ । ढेर से ढेर मनै मानक भाषाहे स्वीकर्ठैं कलेसे येकर बिकास बराहाली हुइठ ।

३. स्थानिय प्रयोगमे नाइअइना

मानक भाषा स्थानिय बेल्साइमे नाइआइठ । स्थानिय बेल्साइमे अइना कलक भाषिका हो । भाषिकासे उप्पर उठके सहमती अनुसार, ब्याकरण अनुसार बेल्सना परिष्कृत भाषा नै मानक भाषा हो ।

४. एकदोसरसे बोलेबेर माध्यमके काम कर्ना

मानक भाषा माध्यमके काम करठ । जस्टे खस, आर्य, आदिवासी जनजाति, मुश्लिम, मधेशीहुक्रनसे बोलेबेर वा अन्य भाषाभाषिनसे बोलेबेर नेपाली भाषा माध्यमके रुपमे बेल्सेपरटा । मानक भाषा बनजिलेसे काल्हके दिनमे पूरुबसे पच्छिउँक थारुनसे बोलेबर उहे मानक थारु भाषा हमार माध्यम बनी ।

५. सुस्पष्ट ओ सुनिश्चित रहठ, प्रयोगमे कौनो भ्रम नाइरहठ

मानक भाषा भाषिका हस नाइचलठ । येकर अपन बिधिबिधान, नियम, ब्याकरण रलक ओरसे सुस्पष्ट ओ सुनश्चित रहठ । का लिख्ना, कैसिक बोल्ना कहना येमने कौनो भ्रम नाइरहठ । येकर डगर फरछ्वार रलक ओरसे भुलैना समस्या नाइरहठ ।

६. आवश्यकता अनुसार लगातार बिकसित हुइठ, लावा शब्द लेहना ओ बनैनामे समर्थ रहठ

जब मानक भाषा बनजाइठ, टब यी बराहाली (हाल्हल) बार्हठ । बराहाली काकरे बार्हठ कलसे यी ढेर से ढेर पहुना शब्दहे लेहेसेकठ ओ लावा शब्द बनाइसेकठ, टबेमारे यी फरगर रहठ ।

७. यी सकहुनके लग अनुकरणीय रहठ

मानक भाषा सक्कु भाषिकाके लग अनुकरणिय रहठ । सब बोली बोलइया मनै यिहीहे आधार मानेलग्ठैं काकरे कि येकर निश्चित नियम, बिधिबिधान रहठ । उहेमारे लिख्ना बोल्नामे ढिरे ढिरे सहजिले बनटजाइठ ।

८. यी साधु, परिनिष्ठित, धनी रहठ

मानक भाषा सरल, सहज, सभ्य रहठ, टबेमारे यिहीहे साधु, परिनिष्ठित भाषा कहठैं । यी धनी रहठ । भाषिका स्थानियस्तरमे बोलजिना हुइलकमारे ठोरचे छिहरफुहर फे हुइसेकठ, मने यी माध्यम भाषा हुइलकमारे साधु, सभ्य, परिनिष्ठित रहठ ।

मानक भाषामे रहना गुण यिहे हो । मानक भाषा बनैना हो कलेसे हमरे सबजाने अपन भाषिकासे उप्पर उठही परी । पुरुबसे पच्छिउँसम् अक्केठो मानक भाषा बनैना हो कलेसे सकहुनके भाषिकाहे ठोरबहुट समेटही परी, सकहुनके भाषिकामे रहल मौलिक शब्दहे पहिचान करही परी । मौलिक शब्दके पहिचान करके मानक भाषाहे लिरोल, मैगर, मलार बनाई परी, टा कि उ भाषाहे सक्कुजाने माया करैंह्, डुलारैंह्, बोल्लेसे अपनत्व महसुस करैंह ।

बहसमे ढिकाई

बि.स. २०७३ सालमे पहिल ‘थारु साहित्यिक म्याला’ दाङ घोराही ओ राजपुरमे उसरल हो । उ मेलामे साहित्यकार ओ लेखक सुशिल चौधरी कार्यपत्र प्रस्तुत कर्ले रहैं । प्रस्तुत कार्यपत्रम देवनागरी लिपीक सक्कु स्वर ओ ब्यञ्जन बर्ण बेल्सना, मने थारु निमांग (लिरोल) शब्द लिखेबेर भर “ऋ, ञ, ण, त, थ, द, ध, श,ष,क्ष,त्र,ज्ञ” नाइलिख्ना बात उल्लेख कर्ले रहैं । मने उहे साल (२०७३ साल) सावन १ से ३ सम् घोराहीमे उसरल‘डंगौरा भाषाके बर्ण निर्धारण गोष्ठी’निचोर निकारल कि “ञ, ण, त, थ, द, ध” के पच्छिउँहा थारुनमे उच्चारण नाइहुइठ । ‘ञ, ण’ के काम ‘न’ करडारठ, जस्टे कि पञ्च–पन्च, अखण्ड–अखन्ड । टबेमारे ‘ञ, ण’ के सटहा ‘न’ लिखी ।“श ओ ष” के काम स करडारठ । टबेमारे “श ओ ष” के सटहा ‘स’ लिखी । “क्ष, ज्ञ” हे, “छे ग्यँ” लिखे सेकजाइठ । टबेमारे हमरे जस्टे बोल्ठी, ओस्टे लिखी । गोष्ठीके यी निचोरहे टमाम कलम चलुइया लागू कर्नै कलेसे टमाम कलम चलुइया ठोरचे यिहे निचोर, ठोरचे अपन पुराने लिखाई कायम कर्नै । अग्रज लेखकसँगे कुछ लेखक घोराही गोष्ठीके उ निचोर ठिक नाइहो, थारु ‘त, थ, द, ध’ फे उच्चारण कर्ठैं कहनै ओ लिख्नै । हो यिहे समयसे मानक भाषाके बहस जोरसे ढिकल बिल्गाइठ ।

भाषक बहसमे खासकैके ३ ठो समुह बिल्गाइठ । पहिलपच्छिउँहा थारुनमे ‘त, थ, द, ध’ के उच्चारण नाइहुइठ, टबेमारे जस्टे बोल्ठी, ओस्टे लिखी, फाल्टु अच्छर काकरे लिख्ना कना, डोसर अब जमाना बडलगिल, जमाना अनुसार हमरे फिरगिली, लावा मनै “त, थ, द, ध” फे उच्चारण कर्ठैं, टबमारे देवनागरी लिपीक सब नियमहे मन्ना चाही कना ओ तीसर कलेक आगन्तुक शब्दहे जस्टेके टस्टे लिख्ना ओ थारुनके अपन ठेट (निमांग/लिरोल) शब्दहे भर अपन बोली उच्चारण अनुसार लिख्ना कना समुह हो ।

लेख लिखटसम् बहसमे अब्बे ढेउर भाषा बिद्वान, साहित्कार, भाषक बारेम चिन्ता करुइया, चास ढरुइया टानगिल बाटैं, लपेटगिल बाटैं । कोई बोलके, कोई लिखके सहभागी होगिल बाटैं । महेश चौधरी, गोपाद दहित, कृष्ण सर्वहारी, लक्की चौधरी, छविलाल कोपिला, रामबहादुर चौधरी, सुशिल चौधरी, अनिल चौधरी, रामसागर चौधरी, भुलाई चौधरी, भोलाराम चौधरी, मानबहादुर चौधरी, कनैलाल चौधरी, कुछतनारायण चौधरी, कारी महतो, सम्पतलाल चौधरी, सोम डेमनरौरा जैसिन तमाम विद्वान, बुद्धिजीवी येमने सहभागी हुसेकल बाटैं । बहस जारी बा, सहभागी हुइनाक्रम फे जारी बा । ढेउरजैसिन बुद्धिजीविहुक्रनके निचोर बाटिन् कि “पहुना शब्दहे जस्टे आइल ओस्टे लिख्ना, हमार ठेट शब्द (जौन ब्राम्हन÷क्षेत्री नाइबोल्ठैं) हे हमार उच्चारण अनुसार लिख्ना ओ सेक्नासम् अपन ठेट शब्दहे खोज्ना, बेल्सना । मिहिन लागठ, बहससे यिहे निचोर निक्रल बा ओ निकरी ।
थारु साहित्यिक सम्मेलनके एक हिरगर खुँटा कृष्ण सर्बहारीफे बहसके प्रक्रियामे आगन्तुक शब्द, तत्सम शब्दहे जसके टस लिख्ना सहमती जनासेक्ले बाटैं। भादौ २२ गते मै ‘देवनागरी लिपी हमार भाषाहे खाचुक्ले बा । देवनागरीक गुरुहुक्रे बरसौंबरस हमरन देवनागरीमे अभ्यास कराके देवनागरीबिना जिए नाइसेक्ना बनाडर्नैं । पानीबिना मछरीनके जा हाल रहठिन्, देवनागरीबिना हमार हाल फे उहे बा । देवनागरी लिपीके ब्याख्या विश्लेषण करुइयाहुक्रे हमार दिल दिमागमे अटरा गँहिरसे पैंठगिनैं कि ओइनके हर चिज, बात, लिखाई, बोलाई हमरन सही लागे लागल बा । हमरन लागे लागल बा कि अगर त, थ, द, ध फेंकडेलेसे हमार भाषा अपुरो रही । मने मिहिन नाइलागठ कि “त, थ, द, ध, ञ, ण, श, ष, क्ष, त्र, ज्ञ” ११ ठो अक्षरहे निकारडेलेसे आकाशे गिरजाई वा हमार काम नाइचली । मज्जासे काम चली, मज्जासे लिखे सेकजाई, बोले सेकजाई । देवनागरीमे अभ्यास कर्लेक बानी हुइलक ओरसे किल हमरन का का नाइमिलल हस्, का का झुकल हस्, टिनामे नोन नाइपुगल हस्, उकुसमुकुस लागेहस महशुश हुइटा । बात अटरै किल हो । मने अब्बे मानक भाषाके सवाल उठल बा । मानक भाषा टबे बनी, जब सबजे मनहीं, सकहुनके सहमती जुटी । पुरुबसे पच्छिउँक मनैबिच सहमती जुटाइक लग ट त, थ, द, ध लेहही परी, काकरे कि दाङसे पूरुबके जिल्लाओरका थारु त, थ, द, ध फे उच्चारण कर्ठैं । सकहुन सँगे लैजाइक लग फे यी अक्षर हटैना सही नाइहो कना मिहिन लागठ’ कहके फेसबुकमे स्टाटस् लिख्ले रहुँ । उ स्टाटसमे लक्की चौधरी फे प्रतिक्रिया डेले बाटैं, लिख्ले बाटैं “भाषालाई समृद्ध बनाउँ, थारु ठेट शब्द पनि प्रयोग गरौं, त्यसको अर्थसहित शब्दकोष निर्माण गरौं ।”रोदन कुश्मी, शत्रुघन चौधरी, दिलिप चौधरी, बुधसेन चौधरी, दिनेश चौधरी फे आगन्तुक शब्दमे “त, थ, द, ध” बेल्सना, मौलिक शब्दहे उच्चारण अनुसार बेल्सना बातमे सहमती जनैले बाटैं, जौन मजा बात हो ।

मातृ भाषा पाठ्यक्रम बिशेषज्ञ कुछत नारायण चौधरी कहठैं “मैथिली, भोजपुरी, अवधि सबजाने मानक भाषा बनाडर्नै, हमरे बहुट पाछे परगिली, हमरे त, थ, द, ध हे फे नाहटाई, संयुक्त अक्षरहे फे आवश्यकता अनुसार बेल्सी । सक्कु ठाउँक थारुनके मौलिक शब्द पहिचान करी, जौन शब्द कौनो भाषामे नाइहो, उहीहे हमार मौलिक शब्द मानी, शब्दकोष बनाई, शब्दकोष बनाके टब ब्याकरण बनाई । ब्याकरण बनी टब हमरन लिख्ना सहजिल हुई । मौलिक शब्द उच्चारण अनुसार लिखी, आगन्तुक शब्द, तत्सम, तद्भवहे कौन भाषासे आइल उहे भाषा अनुसार लिखी । इ, ई फे स्टे«स कैसिक परटा उहे अनुसार लिखी । दीर्घ ‘ई’ फे राखी, आवश्यकता अनुसार बेल्सी । ‘कई’ लिखी कि ‘क’ मे ऐकार डैके ‘कै’ लिखी, टमाम बारेम फे निचोर निकर्ना बा । अइसिन कर्लेसे मानक भाषा बनी ओ मजा रही ।” मिहिन कुछत नारायण ज्यूके यी बिचारसही लागल बा ।

भाषा बहसके निचोर

छोटकरीमे कलसे बहसमे सहभागी हुइल ढेउर बुद्धिजिवीनके अनुसार मानक भाषा बहसके अभिनसम्के निचोर बा कि “त, थ, द, ध’जैसिन देवनागरी लिपीके ढेउर शब्द हटैना मजा नाइहो, नाहटाऊ, आगन्तुक (पहुना) मे बेल्सना ओआवश्यकता अनुसार बेल्सना ठिक रही, अपन ठेट शब्दके जोरसे खोजी करो, ओ अपन उच्चारण अनुसार बेल्सो ।”मिहिन लागठ शायद यिहे निचोर पाछेटक फे रहे सेकी । यी निचोरसे हमरन फाइदा फे रही । हमरे टमाम शब्द लेहे सेकब, लावा बनाई सेकब, ढेर शब्दहे बोलाई (उच्चारण) अनुसार लिखे सेकब । यी कामसे पहुना शब्दके स्वागत ओ सम्मान फे हुई, हमार अपन बोलाई, मातृ लवज, उच्चारणके संरक्षण फे हुई । अपन ठेट शब्दके ढेर खोजी फे हुई । खोजखोज बेल्सना कामसे हमार अपन ठेट शब्द बार्ही, ओ पहिचानके संरक्षण फे हुई ।

मानक भाषक चुनौती

अब्बे मानक भाषा हाल्हल बने, भाषक बिकास होए, सकहुनके बिचमे मेलमिलाप बर्हे, बोले लिखेबेर सहजे होए, अपने भाषामे परहाई होए, सब थारुनबिचमे माया बर्हे कहना सकहुनके सोंच हो, चाहना हो । मोर फे भारी चाहना हो, मने सच कहुँ कलेसे हाल्हल बन्ना सम्भावना भर मै कम डेख्ठुँ । जब नेपाली भाषा मानक भाषा बनगिल टो हमार भाषा मानक नाइबनेसेकी ? हमरे महासहजे कहडेठी । मने ब्यबहारमे उटर्ना ओटरै कर्रा बा ।

नेपाली भाषा सबजाने स्वीकार करके लागू हुइल नाइहो । बि.स. २०१७ सालमे यडि राजा महेन्द्र, उ समयके सरकार, कदम नाइचालट टो सम्भव नाइरहे । हिन्दी पाठ्यक्रमहे हटाके स्कूलमे महेन्द्रमाला लागू नाइकरट ओ ‘खैबे टो खा, नि टो घिंच’ कना बाध्यकारी कदम नाइचालट टो लागू हुइना मुश्किल रहे । वाध्यकारी कदमके कारण किल नेपाली भाषा सफल हुइल हो । भाषा नाइसिखके मनै हेल्हा हुइलग्नै । जे नाइसिखल फेल हुगिल, नौकरी नाइपाइलागल । असफल घोषित हुइगिल । हमरन सोंचे पर्ना बा कि हमारठे कारवाहिक अधिकार बा ? किहिनो फेल पास करे सेकब ?सरकारी कामकाजमे बेल्से सेकब ? सिख्ना, लिख्ना, बाध्यकारी बनाइसेकब ? स्वेच्छासे सबजे स्वीकार करहीं ? सबसे सहजे मनही ? टबेमारे मै ओटरा सहजे नाइडेख्ठुँ । डा.गोपाल दहित थाकससे आयोजित बहसमे मानक भाषाहे सरकारी मान्यता डेहवैना बात, मानक भाषा बन्ना डश, बार साल लागे सेकी कहना बात ओस्टे नाइकर्ले होइँ । हमार लग बस यिहे एक भारी चुनौती बा ।चुनौती हुइटी हुइटी फे खुशिक बात का हो कलेसे, मानक भाषा अब्बे हमार सकहुनके ध्यान अपनओर टन्ले बा । सबजाने कोसिसमे बाटी । थारु कल्याणकारी सभाजिहिहे हमरे सबजे विश्वास कर्ठी, उ फे येमने जोरसे लागल बिल्गटा । मातृभाषा पाठ्यक्रम विशेषज्ञ कुछत नारायण चौधरीक कहाई फे बा कि समय लग्लेसे फे एकठो मानक भाषा बन्ना सम्भव बा । यिहीसे आशावादी रहना ठाउँ बा ।

अभ्यास जारी राखी

चुनौती टो बा मने चुनौतीहे स्वीकार कर्टी हमरन आगे बर्हना फे बा । भाषा हमार पहिचान हो, पहिचानहे बचैना, उहीहे लिरोल बनैना, सर्बमान्य बनैना कोशिश कर्ना हमार सकहुनके कर्तव्य फे हो । मने मानक भाषा नाइबनटसम् का हमार पत्रपत्रिका, अनलाइन खबर, लेख, रचना, गीत, गजल, खिस्सा कहानी नाइलिख्ना टो ? कलम बन्द कर्ना हो टो ? नाई । हमरे अइसिन करब टो आउर पाछे परजाब । एकर लग भाषाविज्ञहुक्रे, भाषक बिद्यार्थीहुक्रे लगहीं । थाकस फे अब्बे लागल बा । मानक भाषा बनल करी, टबसम् हमार फे उ कामम सहयोग पुग्ना, अपनत्व महशुश करैना, गर्ब महशुश करैना कामके लग हमरन सोचही पर्ना बिल्गाइठ । मानक भाषा बहससे निचोर निकर्ना हो कलेसे हमरे तरे डेहल बातमे ध्यानडेना जरुरी बिल्गठ:

(१)पहिल बात कलक हमार शासकहुक्रे हमरन मधेशी कहेहस्, हमार पच्छिउँहा थारु भाषाहे डंगौरा भाषा कहडेनै, डंगौरा भाषा कहटी कि यी साँकिर हुजाइठ, येमने सबजे अपनत्व बोध नाइकर्ठैं । काकरे कि हमरे मोरंगिया, सप्तरिया, चितवनिया, देउखरिया, डंगौरा, डेशौरी, रझेटिया, कठरिया टमाम भाषिका बोलटी । टबेमारे अपनत्व बोध कराइक लग हमरे पच्छिउँओरका मनै ‘पच्छिउँहा थारु भाषा’वा‘बुद्ध भाषा’लावा नाउँ डेहे परल । पुरुबओरका मनै ‘मध्यपूर्बीया थारु भाषा’ नाउँ ठिके डेहले बाटैं ।

(२) पहुना शब्दहे हमरे जस्केटस् बेल्सी । देवनागरी लिपीमे जस्टे लिख्ठैं, ओस्टे लिखी ।सक्कु स्वर, ब्यञ्जन बर्ण बेल्सी ।

(३) हमार अपन ठेट (मौलिक) शब्दहे चिन्ही ओ खोज खोज बेल्सी । मौलिक(ठेट) शब्द हमार पहिचान हो, पहिचानहे बचैना हमार परम् कर्तव्य हो । टबेमारे जानटसम् हमार ठेट, लिरोल शब्दमे भर “ञ, ण, त, थ, द, ध, श,ष,क्ष,त्र,ज्ञ”हे नाबेल्सी ।

(४) नेपाली शब्दके‘र’ ओ हिन्दीके ‘और’शब्दके लग ‘ओ’ लिखी । नेपाली भाषाके ‘तर’ हिन्दीके ‘लेकिन’ शब्दके ठाउँमे‘मने, मुले’बेल्सना । नेपाली ओ हिन्दीम रलक ‘वा, अथवा’के ठाउँमे ‘वा’ ओ ‘कि’बेल्सना । जस्टे– यी ‘कि’ उ , राम ‘कि’सीता । लाल‘वा’ पियर। नेपाली भाषाके ‘बरु’ओ हिन्दी भाषाके ‘बल्कि’ के ठाउँम ‘बिन्से’शब्दहे बेल्सना । जस्टे बरु खाना खाएर आउँदा ठिक हुन्थ्यो (बिन्से खाना खाके अइले मजा रहट) ।

(५) शब्दके शुरु ओ बिचमे इकार आइकलेसे ह्रस्व ओ किनारे आइकलेसे दिर्घ ई बेल्सी । जस्टे हाजिरी, मिसिल, मयरी ।

(६) सक्कुक्रियाहे मौलिक उच्चारणमे बेल्सी । जस्टे :– आइठ, जाइठ, खाइठ, पियठ, नेंगठ, घुमठ ।

ओरौनी

ओरौनीम कहे सेकजाई कि मानक भाषा बारेम बहुट बहस होसेकल ओ हुइटी बा । हमरन बहुट सिखाई फे हुइल बा । पुरुबसे पच्छिउँक थारु सबकोई चाहटी कि हमार एकठो मानक भाषा बने । मने हमारठन अपन लिपी नाइहो । लिपी नाइहुइलक कारण हमारबिचमे समस्या आइल हो । अब यिहे लिपी स्वीकार कर्नक डोसर बिकल्प हमारठन नाइहो ।जब यिहे लिपी स्वीकार कर्ना बा कलेसे, यिहीहे लत्याई सेक्ना ठाउँ फे नाइबिल्गाइठ । डोसर,जेकर लिपी हो, ओइने कहठैं कि “त, थ, द, ध” के उच्चारण पच्छिउँहा थारुनसे नाइहुइठ, मध्य ओ पूर्बीया थारुनसे हुइठ ।” मानली कि यी अबस्थामे पच्छिउँहा थारु कहहीं कि हमरे उच्चारण कर्ठी टो गलट के ठहरी ?टबेमारे बुझेक पर्ना का हो कलेसे ढेउरहस् बहस करुइया, लिखुइया कहसेक्नै कि आगन्तुक शब्द जस्टेके टस्टे लिख्ना, अपन लिरोल (निमांग) शब्दहे अपने उच्चारण अनुसार लिख्ना कलसे बहुट समस्या टो यिहनेसे ओरागिल । यडि अब फे कोई कही कि “हमरे थारु भाषा लिखेबेर सब शब्दउच्चारण अनुसार लिखब”, कोई कही “हमरे फिरगैली टबेमारे देवनागरी लिपीक सक्कु अक्षर ओकरे अनुसार बोलब, लिखब ।”टो यी बात गलत हो, यिहीसे बुझे परल कि यी चट्टानी अडान गरबर करेसेकी ! अब्बे हमरन बुझेक पर्ना बा कि हमरे सब मिलजुलके आगे बर्हना बा । आनेक बहुट भाषा, बहुट उच्चारण फे सिख्ना बा, अपन भाषा, अपन उच्चारण फे बचैना बा । पुरुब ओ पच्छिउँहे फे जोर्ना बा । जोर्ना हो कलसे लचकडार बन्ना जरुरी बा । मानक भाषा बनाइबेर कुछ लेना, कुछ डेना परेसेकठ, येकर लग फे हमरे टैयार रहना चाही । मानक भाषा सर्बस्वीकार्य वा ढेउर मनैनसे स्वीकार्य नाइहुइटसम् वा सरकारसे बाध्यकारी नाइबनाइटसम् लागू हुइना कर्रा रहठ । काकरे कि बहुट भाषिकामे बँढल मनै अक्केठो मानक भाषाहे सहजे स्वीकार नाइकर्ठैं, इतिहास कहठ ।

टबुपर आजकाल्ह चलल यी बहसम हमार पुर्खा पुरनिया भाषाबिज्ञ, भाषक बिद्यार्थी, भाषाके बारेम् चिन्ता प्रकट करुइया, पाठ्यपुस्तकहे आकार डेहुइया जटराजाने सहभागी बाटैं, मोरसकहुनप्रति ओटरै सम्मान बा । थारुनके सबसे लग्गेक संगठन थारु कल्याणकारिणी सभाहेसम्मान बा। सकहुनके जौन चिन्ता बा, मोर फे चिन्ता उहे हो । मोर बिन्टी बा कि सबजाने हाल्हल येकर बारेम गँहिरसे सोंची ओ निचोर निकारी । एकडोसरहे गोझिक गोझा नाकरी । सीसाहस् आँखर अडान कोई नाली । कबो कबो हमार चट्टानी अडान, झोंकमे करल निर्णय गलट हुइसेकठ । गलट निर्णय झगरक जर बनेकसेकठ । मोर बिन्टी बा कि ‘मानक भाषा बनाइक लग, बर्ण निर्धारण करेक लग, शब्दकोष ओ ब्याकरण बनाइक लग हाल्हल भाषा बिज्ञ, मातृभाषा पाठ्यक्रम बिज्ञहुक्रनके एकठो समिति बने ओ भाषक घानाहे सहजे से निखारे । सकहुनके कल्याण होए ! शुभ डिन !’

लेखक पहुरा थारु दैनिकके भाषा सल्लाहकार हुइटै ।

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