थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत १७ अगहन २६४६, शनिच्चर ]
[ वि.सं १७ मंसिर २०७९, शनिबार ]
[ 03 Dec 2022, Saturday ]

थारू भाषा बहसमे सर्वहारीके केल विरोध काहे ?

पहुरा | ६ कार्तिक २०७७, बिहीबार
थारू भाषा बहसमे सर्वहारीके केल विरोध काहे ?

सुनसरीके रामसागर चौधरीजीसे कृष्णराज सर्वहारीहे सम्बोधन करके भर्खर फेसबुकमे नम्मा स्ट्याटस लिखले बाटै । थारू भाषामे त थ द ध के बहिष्कारबादसंग मै सहमत नइहु कना प्रसंगमे उहाँक कहाई केन्द्रित बा ।

रामसागरजी, यहाँके सुझाव मननयोग्य बा मने कुछ बुँदाहुकनमे मोर असहमति बा । थारू भाषामे ‘तथदध’ वहिष्कारवाद नइहो, डंगौरा थारू भाषामे पो नइहो वा यी ध्वनी नइसुनठ कना हो । साथे अध्ययन अनुसन्धानसेफे प्रमाणित करसेकल बाट हो । सन् २००३ मे एडवार्ड बोइमसे ‘अ डिस्क्रिप्टिभ फोनोलोजी अफ डंगौरा थारू’ कना शीर्षकमे करल अध्ययनसेफे डंगौरा थारू भाषामे ‘तथदध’ ध्वनी नइरहल खोज करले बाटै । ओस्टेक, २०७३ साल सावन १ से ३ मे आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठानसे घोराहीमे करल थारूविज्ञ लगायत भाषाशास्त्रीहुक्रे डंगौरा थारू भाषाके वर्ण निर्धारण करेबेरफे यी ध्वनी नइरहल निष्कर्ष निकरले बा । थारू मानक भाषा बनाईबेर थारू वर्णमालामे ‘तथदध’ धारे नइपरठ कना सर्वहारी लगायत हमार विरोध नइहो ।

पुर्विया थारू भाषाहुकनमे ‘तथदध’ वर्ण पैठै ओ उहोर लिखजाइठ, यिहीहे पश्चिमा थारूहुक्रे स्विकरले बाटै कलेसे डंगौरा थारू भाषामे ‘तथदध’ नइपाजाइठ कहलेसेफे पुर्विया थारू मित्रहुक्रे यिहीहे काहे स्विकारे नइसेकल ? नेपाली लगायत और भाषामे फे कुछ वर्णके प्रयोग कम वा नइहो, तबफे वर्णमालामे धारल बा कहटीमे य सक्कु थारू वर्णमालामे धारे परठ कना तर्कपूर्ण नइहो । सक्कु भाषाके ध्वनी अक्के रहठ कनाफे नइहो, फरकफे हुई सेकठ । नेपाली भाषा ओ डंगौरा थारू भाषा देवनागरीमे लिखलेसेफे एक्के नइहो ।

नेपालीमे ‘क’ ध्वनीके महाप्राण ’ख’ हो, ‘ग’ के ‘घ’ हो, ‘च’ के ‘छ’ हो, ‘ज’ के ‘झ’ रहल जस्टे डंगौरा थारूमे ‘ङ, (ङ्ह) म, (म्ह) न,(न्ह) , र (र्ह), ल, (ल्ह) के फे महाप्राण भेटल बाटै । जौन नेपाली भाषामे नइपाजाइठ, ओसिन हुइलेसेफे नेपाली वर्णमालामे यी वर्णहुकनहे काहे नइधारल ? यदि नेपाली वर्णमे पैना सक्कु ध्वनी हमार नइहुकेफे रख्न हो कना थारू मौलिक भाषाके के अर्थ ? नेपाली वर्णमालामे रहल ञ, ण, श, ष, क्ष, त्र, ऋ, लृ, कि ते संयुक्त वर्ण हुइएट कि ते संस्कृतसे साभार करल हुइट । संस्कृत भाषामे पह्रेबेर अइनके उच्चारण सुनजाइ मने ‘श र ष’के सन्दर्भमे नेपाली भाषामे उच्चारण करेबेर तालव्य ‘स’ कैना करल पाजाइठ । टबमारे हुई, नेपाली भाषामे फे यी ‘श ओ ष’ हे हटाई खोजल रहे ।

आब भाषा विज्ञानके बाटमे जाई । मुर्धन्य (palate-alveolar) ‘श’ हे उच्चारण करेबेर जिभके टुप्पाहे तारुके पाछे लैजाके उच्चारण करजाइठ । कौन नेपाली भाषी वा थारू भाषीसे यकर उच्चारण यैसिक करठ सायद ? ‘ष’ के सन्दर्भमे कौन ‘श’ ’स’ उच्चारण कैना अपनही अस्पष्ट बा । भाषा पहिले बोलाके ओ पाछे लिखाइ हो । देवनागरीमे लिखना सक्कु भाषा वा भाषिकाहुक्रे (phonemic language) हुइट जैसिक बोल्ठै ओ सुन्ठै, ओसिक लिख्न चलन रहठ । दन्त्य ‘त’ सुन्लेसे दन्त्य ‘त’ (विपत्ती) नै लिखजाइठ कलेसे तालव्य ‘ट’ सुन्लेसे ‘ट’ (सापटी) लिखजाइठ । उदाहरणके लाग अंग्रेजीसे आइल हरेक नेपाली आगन्तुक शब्दहुकनमे तालव्य ‘ट’ लिखल बाटै । काहेकी अंग्रेजीमे दन्त्य ‘त’ नइहो । जस्टे कम्प्यूटर, क्यालकुलेटर, कार्ड आदि ।

रामसागरजीसे कहल आवश्यक्ता अनुसार यी वर्णहुकनहे राखी कना रहठ कलेसे अपनेक पूर्वी थारू भाषामे फे श ओ ष नइहो । उदाहरणके लाग मोरङके भोलाराम चौधरीसे लिखल मध्य–पुरबैया थारु भाषाके थारू व्याकरण (२०७४) मे प्रयुक्त कुछ शब्दके प्रयोग हेरी । सैली, व्याकरन, भासा, अछर, बरनमाला, सब्दग्यान, विसेसन, पुरुस आदि । झापासे पर्सासम १२ जिल्लाके थारू भाषाविदहुकनके टमान चरणके गोष्ठीसे बनाइल मध्य–पुरबैया थारु भाषाके शैली पुस्तिका, व्याकरण, शब्दकोश हेरी । मध्य–पुरबैया थारु भाषाके लेखन शैलीमे श ओ ष केल नाही, ञ, क्ष, त्र, ज्ञ वर्णकेफे प्रयोग नइहो । ओ डंगौरा मा श ओ ष के आवश्यकता कहाँ परी ?

अभिनसम ढेर थारू भाषिकाके वर्णहुक्रे स्पष्ट रूपमे वर्ण निर्धारण नइहुइल ओरसे कौन वर्ण धरना वा कौन वर्ण नइरख्ना प्रस्ताव केल बा कलेसे डंगौरा भाषाके केल विरोध काहे ? सर्वहारीजीके केल विरोध काहे ? वर्ण निर्धारण करेबेर कौनोफे भाषामे रहल शब्दहे संकलन करके लघुतम युग्मके आधारमे करजाइठ ओ वर्ण पहिचान हुइठै । यिहे प्रकृया अपनाके डंगौरा भाषाके वर्ण निर्धारण करेबेर ‘टठडढ’ केल भेटलमे दन्तय ‘तथदध’ के का अर्थ ? जबकी उ वर्ण फेला नइरलै कलेसे डंगौरामे ‘ट’ र ‘त’ के अर्थभेदमे का प्रश्न ? अपन भाषा निर्माणके लाग दुसरके भाषामे अर्थ खोज्न कटराके तर्कपूर्ण ?

हम्रे सक्कु जाने आ आपन भाषामे विज्ञ बाटी । डंगौरा थारू भाषामे विल्गाइल सहि बाटहे सर्वहारीजीसे आघे लैजाई खोजटै । यम्ने हठवादी कहे पर्ना कुछ नइहो । मने गोरखापत्रमे थारू पृष्ठ प्रकाशनके बाटमे राजनीति हुइलक हो । थारू मानक भाषा बहस चल्टी रहल क्रममे यैसिन हुइना हम्रे स्वयम् राजनीति करल हुई कहिके स्विकारी । यी बाटमे मै फे सहमत बाटु कि थारू भाषामे विविधता बा ओ एकरुपता नन्नामे समय लग्ना हुइल ओरसे हालहे गोरखापत्रहे थारू भाषामे २ पेजमे ओ २ दिन प्रकाशन कैना अनुरोध करे परल । रामसागरजी, अपनेक भाषा सहज, सरल ओ स्वीकार्य हुई परल कना फेर तीनु ‘श, ष ओ स’ के प्रयोग करके काहे थारू भाषाहे जटिल बनैना ? थारू भाषामे प्रयोगमे नइअइना ‘ञ, ण’ हे काहे वर्णमालामे रख्न ? जटरा कम वर्ण वा जटरा कम शब्द भाषा सिक्न ओटरा सहज रहठ, यिहे बाट भाषा विज्ञानसेफे कहठ ।

यहाँ सर्वहारीजीके बाट केल नाही, हम्रे फे थारूभाषी हुइल ओरसे हम्रहिनहेफे हमार भाषाके माया बा, चिन्ता बा । डंगौरामे ‘तथदध’ नइरहल अवस्थामे उ वर्ण डंगौरा थारू भाषाके मौलिक वर्ण नइहुइट । और थारू भाषामे ‘त थदध’ बा कलेसे उहाँहुक्रे लिखिट, बोलिट, पश्चिमाके मुरी डुखाइके विषय नइहो । भाषा स्वतन्त्र रुपमे जन्मना, परिवर्तन हुइना ओ मर्ना चिज हो मने डंगौरा थारू भाषा पश्चिममे सबसे ढेर बोल्ना भाषा ओ साहित्य सृजना हुइल ओरसे यकर चर्चा हुइल हो ।

अन्तमे, सर्वहारी जैसिन अनुभवी व्यक्तिहे गोरखापत्रके सम्पादन कैनासे हटैनासेफे पूर्व ओ पश्चिमके थारू भाषामे प्रकाशन हुइना मजा हुई । यी मोर फे सुझाव हो । बाँकी भाषा विज्ञानहेफे बुझके आघे बह्रलेससे मजा हुई ।

धन्यवाद, जय गुर्बाबा ।

(लेखक अमर शहिद बहुमुखी क्याम्पस, राजापुर, बर्दियाके क्याम्पस प्रमुख हुइट ।)

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