थारु राष्ट्रिय दैनिक
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[ थारु सम्बत १९ अगहन २६४५, अत्वार ]
[ वि.सं १९ मंसिर २०७८, आईतवार ]
[ 05 Dec 2021, Sunday ]

थारु समुदायमे ‘औंली’ पर्व

पहुरा | ७ मंसिर २०७८, मंगलवार
थारु समुदायमे ‘औंली’ पर्व

नरेन्द्र चौधरी
धनगढी, ७ अगहन ।
‘राई खेती मसुरी, मसुरी खेती राई, ओहे खेतियाम बिछिया हेरान…’ यी गीतके बोली औली उटरलक् दिन गैना गीत हो ।

धनकटनी ओरलक दिन खेतुवामे थारु समुदायके महिला पुरुष परम्परागत पहिरन ओ गरगहनामे सजके मन्डराक टारमे झुम्रा नाँचमे झुम्टी औली उतारेबेर धानके लरुवामे धान कटटी, रहरङगी करेबेर नचुनियक बिछिया हेराइलपाछे गाजाए ।

धानकटनीक अन्तिम दिन रोज औली उटरटी खेतुवामे धान कटटी–कटटी महिलाहुक्रे लगैना सिङ्गार (तिकुली, औंठी, बिछुवा जैसिन सिङ्गारके सामान खेतुवामे हेराइठ कना गितके अर्थ रहल धनगढी उपमहानगरपालिका वडा नम्बर ७ पटेला गाउँक रनियादेवी चौधरी बटैठी ।

‘पहिलेक जवानामे एक महिना धनकटनी, एक महिना बैठौनी, एक महिना धान डौनी चले,’ रनिया कहठी,–‘काम संगसंगे मनोरञ्जनके लाग बैठौनीमे सजना गैना, धनकटनी ओरैलक दिन झुम्रा नाँचमे रमाजाए । अब्बे टे आधुनिक औजार आगिल महिनाभर लग्ना खेती हप्ताभरिम ओराजाइठ ।’

थारु समुदायके किसानहुक्रे धानबाली काटके सेकलपाछे थकान मेटाइक लाग सामुहिक खानापान बनैना, रमैना करठै उहीहे पुर्खानहुक्रे औंली पर्वके रुपमे लेटी धुमधामसंग मनैना करटी आइल बटै यी परम्परा अभिन थारु समुदायमे कायमे बा ।

धनगढी उपमहानगरपालिका–७, पटेलामे १ सय १२ घरधुरी किसान बटै, गाउँभरिक किसानसंग्गे एकरुपले औंली पर्व धुमधामसंग मनैना करल उहाँ बटैठी । थारु समुदायमे पुर्खौसे औंली मनैना चलन रहे, ढेर गाउँओर एकसाथ मनाई छोरलेसेफे पटेला गाउ“मे पत्येक वरस निरन्तर मनैटी आइल स्थनीय रनियादेवी बटैली ।

कैलारी गाउँपालिका–३, लालपुरके गाउँके किसान दुलिराम चौधरीके घरगोटियार एकसाथ मन्डरासंगे झुम्रा नाँच लेके खेतुवा औंली उटर्ना करल बठै । ‘औंली पुर्खौसे चल्टी आइल परम्परा हो,’ उहाँ कहलै, ‘पराम्परा अनुसार सक्कु मिलके मनैना हो ।

यी बरस कार्तिक महिनामे बाढ आके धानके कटनी अस्टव्यस्त बनाइल ओरसे एकसाथ औंली मनाई नइसेकल दुलिराम बटैलै ।

औंली कैसिक उटरठै

धानकटनी ओराइल दिन अन्तिममे बाँचल धान ओइरक एक कोनुवामे बचाइल रहठ । उहे ठाउँमे बाँसके झण्डामे फुलके माला बाँधके कोनुवामे गरना चलन बा ।

कोनुवामे बचल धान ढुगामे एक चो हुलके बायाँ हातसे एक साँसमे काटके हसिया सहिट चढैना करजाइठ । उ संग्गे पानी ओ घरेलु डारुफे चढैना प्रकृतिके पूजा करजाइठ । औली उटारेक लाग घरेसे टिना, डारु लेके जैना, संग्गे रहरंङगी कैना चलन बा । औंली पर्व मनाईबेर अपन नातागोता,चेलीबेटीनहे औंल्याही खाइ बोलैना करजाइठ ।

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