थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत ०९ बैशाख २६४५, बिफे ]
[ वि.सं ९ बैशाख २०७८, बिहीबार ]
[ 22 Apr 2021, Thursday ]
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‘ राना थारु भाषाके लोककथाः ’

सोरठ

पहुरा | १४ चैत्र २०७७, शनिबार
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सोरठ

एक देशमें कक्षराज नामको एक राजा रहय । बो राजा और बोके राजनगरी बहुत खुसहाल रहय । राजाके बहुत साल हुइगय रहय पर बोके लर्का नाभय रहय । एक दिन राजा अपन गुरूके बुलायके बिचरबायी । राजा कहि, मिर तमान साल हुइगय हय बिहाके, पर बालक नाभय हय । कि कोइ ग्रह लागो हय । जैसी हय उइसी बताबओ । तव गुरू कहि, तिर किस्मतमे लर्का त हय पर तिर हाथसे पाप होबैगो ।

राजा कहि– कैसो पाप खुलके बताबओ ?

फिर गुरू कहत हय, तिर घरमें एक कन्याके जलम होबैगो पर तय बोसे पिछु ब्याहइगो ।

ऐसी कहिके गुरू बिदाबारी लैके अपनो घर चलोगओ । राजा बहुत सोचमें पडिगओ । रातदिन गुरूके बात समखय । राजा सोचय कि अपनी बेटीसे बिहा करहओ तओ मोसे बडो पापी और अधर्मी जा दुनियामें कौन होबैगो ।

कुछ दिन बिते, कुछ महिना और कुछ साल बिते । फिर एकदिन राजाके घरमें एक सुन्दरसी कन्या पैदा भै । राजनगरीमें खुसीया छाइ । उते राजा चिन्तामें डुबो हय, अपनी लौँडियाके पालपोसके बडो करहओ फिर बिहा जा कैसो भाग्यको लेखो हय । राजा खुब सोचत हय । इतनो बडो पाप होनसे अच्छो मय जा बेटीके बहा देहओं ।

कक्षराज अपन बेटी बहानके समह्रन लागत हय । राजा मिस्त्रीनके बुल्बात हय । सोनोसे मण्ह्रो दूरसे झल्मलान बारो सन्दुखा बन्बात हय । कुछ रोजमें सन्दुखा सपड जात हय । राजा अपन लौँडियाके सन्दुखा भितर बन्द कर्के नदियामें पुहाय देत हय ।

नदियाके धारयधार सन्दुखा पुहत जात हय । नदियाके जराङ्में सन्दुखा अटक जात हय, तव लौँडिया रोन लगत हय । पुहन लगत हय तव चुप हुइजात हय । ऐसिअय सन्दुखा पुहत पुहत दुसरो गाउँमें पुग्जात हय । नदिया टिकारे कुमडा कुम्डनिया घल्ला बनात होत हय और नदियामें मछर्हा मछरी मारत होत हय । नदियाके धारयधार झल्मल झल्मल करत कुछ पुहत आत कुमडा देखलेत हय । बो का हय कहिके मछर्हानके दिखात हय । देखन ताही सब मछर्हा दौर पडत हय । पानी मैसे निकारके देखत हय त हीरामोती और सोनोसे मण्ह्रो सन्दुखा ।

मछर्हा कहत हय कि, जा सन्दुखा हम निकारे हम लेमङ्ग।

तव कुमडा कहत हय कि, मय देखो तव तुम निकारे । उपरके तुम बाँटलेव, सन्दुखा भितर जो निकरैगो बो मोके दैदिअओ ।

कुमडाके बात सुनके सब मछर्हा मानजात हय । मछर्हा सोनेके मण्ह्रो चिज सब लैचले जात हय खाली सन्दुखा छोड जातहय । कुम्डनिया अपन लोगासे कहत हय कि सन्दुखा खोलके देखओ भितर का चिज हय । सन्दुखा खोलके देखत हय त बो भितर लौँडिया खेलत होत हय । निरवंशी कुमडा कुम्डनिया लौँडियाके पायके बहुत खुस हुइजात हय । बे अपन घरे अपन लौँडिया बनायक लैचले जात हय ।

कुमडा कुम्डनिया अपन लौँडियाके नाउँ सोरठ धरदेत हय । सोरठके अपने सगी बेटि जैसो पालत हय । ऐसी दिन बितत जातहय । सोरठ धिरेधिरे बडि होत जात हय । कुछ साल बाद सोरठ जवान हुइजात हय ।

अइसी सोरठ सुथरी रे सिँक बरण करिजायेँ
सिँक बोल पानी पियास रे आँठकाँठ मरिजायेँ

सोरठ इतनी सुथरी रहत हय कि पनिहारिन बनके जब कुँइयामें पानी भरन जात हय तव प्यासे पानी पियन भुल जात हय । गाउँ बारे कहत हय सोरठसे ब्याह करन बाले कैसो होबैगो । जौन बिहा करैगो बोके भाग खुल्जाबैगो । काम करन इकल्लो सोरठ घरसे बाहिर निकरत रहय । काम ना होय तव बो घरसे बाहिर न निकरत रहय । सोरठकी ऐया आँगनमें सुखौनो डार जात हय और अपन लौँडियासे देखन कहत हय । राजाके घोडा एकदम सुखौनो खान आत हय तव सोरठ घोडा दलान घरमैसे निकरो करत हय ।

बखत कटत गओ, पुरानी बात राजा भुलत गओ । एकदिन राजा घोडा लैके फिरन निकरत हय । जाते–जाते बो सोरठके गाउँमें पुग्जात हय । सोरठकी ऐया अपन आँगनमें सुखौनो डारके काम करन चलिजात हय और सोरठसे सुखौनोके लखबारी करन कहिजात हय । राजाके घोडा सुखौनो खानक घरिघरि आत हय, सोरठके घरिघरि दलान कोनेसे निकरन पडत हय । घोडा दलात सोरठके राजा लै देख । सब गुणसे भरि सोरठ राजाके मन पड्जात हय । राजा कहत हय, जा इतनी सुथरी राजकुमारी जैसी लौँडिया कौनक हय ।

दक्षराज नगरमें कचहेरी बुल्बात हय और सोरठके दौवाके फिर बुल्बात हय । राजा कचहेरीमें सोरठसे बिहा करनको प्रस्ताब धरत हय । कहत हय कि मोंके तेरी लौँडिया मन पडी हय । मय सोरठके अपन रानी बनामङ्ग। राजाके बात कोइ ना टारपात हयेँ । कुमडा राजाके बिहाके हुँकारी दैदेत हय ।

राजाके घरमें और राजनगरीमें बडो उत्सबके साथ बिहाके तयारी होन लगो । होना सोरठके घरमें फिर बडो धुमधामसे बिहाके तयारी होबय । सोरठ अपन सहेलीसे पुछि कि मिर होनबालो दुलहा कैसो होबैगो और कैसेक आबैगो ? सोरठके सहेली मस्कि कि, आसपास घोडा हुइहय । झगापगा पैँधे हाथियामें जौन बैठो होबैगो बहे तेरो दुलहा होबैगो ।

राजा कुमडाके घर ब्याहन आओ । सोरठ सजके बैठि होत हय । सोरठ राजाके हथियामें बैठो सरमें पगा बाँधे मोखोसे देखत हय । अन्तर ज्ञानी सोरठ जान लेतहय कि जौन दुलहा आओ हय बो बोके दौवा हय । फूलसे सजो मण्डपमें कक्षराज राजा झगापगा बाँधे आत हय । फिर सोरठ आत हय । मण्डपके आसपास राजघरानोके लोग, बिहामें आयभय तमान देशके राजारानी, राजकुमार और नगरनगरीके आदमी जम्जमाने होत हय । मण्डपमें सोरठ राजासे कैसे कहओ कहिके समखत हय । फिर सोरठ भ्युँरबान बखत हुँवैपर कहत हय,

मय बेटि जयचन्दकी और पाली बलकुमार
जा कलजुग अनरित हय बेटिक ब्याहय बाप

सोरठके जा बोल सुनके कक्षराज झस्कत हय और पन्डितके कहिभइ पुरानी बात समख लेत हय । तओ राजा सोरठसे कहत हय,

फिर कहो बेटि फिर कहो बेटि कहो बेहि बोल
बेहि बोलके कारन तिर घरसे करहओ ब्याह

कक्षराज राजा फिर सोरठकी ब्याह बहे मण्डपमें बडे धुमधामसे सोरठके मन पडो लौडासे करबाय देत हय । राजा अपन हाथसे सोरठके कन्यादान करत हय ।

कैलारी गापा–९, गदरिया, कैलाली

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