थारु राष्ट्रिय दैनिक
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यौन ओ प्रेमसे जुरल गोद्ना संस्कृति

पहुरा | २१ असार २०७७, आईतवार
यौन ओ प्रेमसे जुरल गोद्ना संस्कृति

लखन चौधरी
धनगढी, २१ असार ।
पछिल्का समय बठिनियाहुक्रे आपन छाती, ढोह्रीलगायत ठाउँमे ट्याटु छेडैठै । ठरियाहुक्रे
पखरा, पिठारलगायत ठाउँमे छेडैठै । ट्याटुके क्रेज गाउँसे ढिउर शहरिया ठर्या बठिनियाहुकनमे बिल्गाइठ । मने ट्याटुके विशेषताबारे आजकालके पुस्ता मौन बिल्गैठै ।
लौवपुस्ता ट्याटु कलासे प्रभावित हुइलेसे फेन पुरान पुस्ता भर ‘गोद्ना’ अर्थात हाठ ओ गोरमे चित्र बनैना संस्कृतिसे प्रभावित रहे । टमान जातजातिमे यी संस्कृति विद्यमान रहल पजाइठ । उ मध्ये आदिवासी थारु समुदायके बाजे पुस्ता अर्थात आजसे ६ दशकपहिले बहुट प्रचलित संस्कृतिके रुपमे रहल बटाजाइठ ।
कञ्चनपुर जिल्लाके बेलौरी नगरपालिका ७ पौलाहा गाउँके ६० वर्षीया भलुनी थरुनी आपन गोराभर करिया टीका छेडैले बाटी ।
उहाँ आपन भोज हुइलपाछे करिया टीका छेडाइल हुइटी । जौनबेला थारू जातिमे भोज करल एक अठ्वारपाछे आपन लैहर जैना ओ शरीरके टमान ठाउँमे टीका छेडैना अर्थात गोडैना प्रचलन रहल उहाँ सम्झठी ।

टिकिहिनिया (गोरा छेड्ना मनै) से गोरा छेडाइल बटैटी उहाँ– ‘औरे जहन डेखके बहुट शौख लागे । ९ ठो सुईसे छेडै । ४/५ घण्टा लगाके छेडलपाछे गोरा सुवाके हाठिनके गोरहस होजाए । सुवाके लाल हुइल गोरामे बेसार ओ तेल लगाडिठ । औषधीके काम करे ।’
उ बेला भोज हुइल जन्नी मनै गोरामे टीका छेडाइक पर्र्ना संस्कृति रहे । गोरा नैछेडैना जन्नी मनैनहे समाजमे नैमजा नजरसे हेरजिना उहाँ बटैठी ।
गोद्ना संस्कृतिहे थारु जातिमे प्रेम ओ यौनके प्रतीकके रूपमे समेत लेहल बटाजाइठ । थारु संस्कृतिविद् अशोक थारु थारु जातिमे भोज हुइल जन्नी मनैन्के गोरक् घुठ्ठीसे लेके ठेहुनीसम टमान मेरिक चित्र बनैना संस्कृति रहल बटैठै । खासकैके सौन्दर्य ओ यौनके प्रतीक मानजिना मजोर ओ दैनिक प्रयोगमे अइना चन्नी, बह्रनी, चुल्हा, हेंगा, ककुवा, हँसियालगायतके चित्र छेड्ना संस्कृति रहल रहे ।
पौलाहा गाउँक् ७४ वर्षीया बुझौनी थरुनीके फेन हाठ ओ गोरभर टमान मेरिक चित्र छेडैले बाटी ।
चित्र छेडैलेसे गोसियाक् किल नाई परिवारजनसे फेन मैया मिल्ना बुझौनी बैटैठी ।
गोर छेडाइल डेखैटी बुझौनी हली– ‘यहिसे गोसियाक् किल नाई सास ससुरसहित सक्कुजहनके माया फेन मिलल महसुस होए ।’
गोदना संस्कृतिके सम्बन्ध पूर्वजन्मसे फेन सम्बन्धित रहल मिथक फेन कायमे रहल थारु संस्कृतिके जानकारहुक्रे बटैठै ।
गोरामे चित्र छेडैनाके सुन्दरता टे पली बा । मने मुलेसे स्वर्ग जैलेसे स्वर्गमे ओहे छेडाइल टीकासे गोसिया आपन गोसिनियाक् पहिचान करेसेकजिना लोकविश्वास थारु समुदायमे रहे ।
संस्कृतिविद् थारु कहठै– ‘गोद्ना संस्कृतिके सम्बन्ध गोसिया गोसिनिया बीचके सम्बन्ध जन्म जन्म रहन जनविश्वास रहे । स्वर्गमे जैलेसे गोद्ना हेरके गोसिया आपन गोसिनियाहे पहिचान कर्ना माध्यम रहठ हुँ । जेहिसे माया, प्रेम ओ यौन सम्बन्ध अतुत रहना बुझाइठ ।’

वीरताके निशानी
गोद्ना संस्कृतिहे थारु जातिमे वीरताके प्रतीकके रुपमे रहल फेन बटाइठ । सौन्दर्यमे किल सीमित नाई रहल बटैटी संस्कृतिविद थारु वीरताके प्रतीकके रुपमे अथ्र्याइठै ।
ऐतिहासिक प्रसंग सुनैटी संस्कृतिविद् थारु आघे कहलै– ‘एक समय रतनु ओ घोर्सेमगर राजुवाबीच लराई मचल रहे । घोर्से मगर राजा युद्धमे अनेक प्रयास कर्लेसे फेन पराजय भोग्लै । युद्ध जिट्ना रणनैतिक योजनामे उहाँके भरदारहुक्रे महिला सेनापतिके रुपमे थारु महिला लाठीहे बनाइक लाग सुझाव डेलै । रजुवा फेनसे युद्धके लाग तयार हुइल । अन्ततः लाठीके सहयोगमे युद्ध जिटल । जीतके खुशीयालीमे लाठी आपन शत्रु पक्षके रगतसे ठेहुनिसे घुठ्ठीसम सजैली । ओकरपाछे वीरताके प्रतीक तथा निशानीके रुपमे गोरा छेड्ना शुरुवात हुइल मिथक बा ।’
जौन लराईके क्रममे गाइल कुछ लाठी गीत ओ श्रृंगारिक तथा ऋतुु गीत फेन जनजीवनमे रहल बा ।
लाठी गीत असिके सुनैठै संस्कृतिविद् थारु:–
हाँ रि टोर घर कुसल रटनु मोर घर कुसल रि आवै
कुसलीक् बात् कहोरे समझा
निच उठी जैहो रे रतनु लाठी रे बलान

… … … … … … … … … … …
ऋतु गीत
पुरुवसे उम्ररल कारी बडरिया
कारि बडरिया पश्चिउ ओर अइल
जैस भर उमरल, डैया लाठी कुवर
उत्तरसे उम्ररल सेन्दुरी बडरिया….।

हाठ गोर छेडैना कौनो फेन मनैन्के ऐच्छिक विषय बनल बा । प्रेम, त्याग ओ वीरताके विम्ब मानजिना प्रचलन लोप होसेकल बा । मने कुछ परिमार्जन करके गोद्ना संस्कृतिके व्यवसायकरण करके संरक्षण करे सेकजिना संस्कृतिविद् थारुके कहाइ बा ।

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