नारीवादी दृष्टिकोणके आधारम बुढनी उपन्यासके विश्लेषण
लेखसार
यि अध्ययनम इन्दु थारूद्वारा लिखल बुढनी उपन्यासके नारीवादी मूल्य, मान्यता र दृष्टिकोणके आधारम विश्लेषण कैगिल बा । यी अध्ययनम पुस्तकालय विधिके प्रयोग कैक गुणात्मक प्रकृतिके वर्णनात्मक ओ संश्लेषणात्मक ढाँचामा कैगिल बा ।
बुढनी उपन्यासह प्राथमिक स्रोत ओ सन्दर्भ पुस्तक एवम् अन्य विभिन्न लेख, अनलाइन सामग्री, जर्नल द्धितीय स्रोतके रुपम लेकन विश्लेषण कैगिल बा । उपन्यासम नारीवादी सिद्धान्त र मान्यताके आधारम समाजम लैङ्गिक सम्बन्ध, वर्गीय चिन्तन, निम्न वर्गप्रति पितृसत्तात्मक धारणा, नारीवादी चेतना र स्वतन्तत्रा, नारी सङ्घर्ष आदिके आधारम विश्लेषणात्मक रुपम व्याख्या कैगिल बा । बुढनी उपन्यासके आधारम समाजम उच्च वर्ग, ठूलावडा मनै निम्न वर्ग उपर कसिक थिचोमिचो, अन्याय, अत्याचार र दमन शोषण कर्ठ कना बात यी लेखम डेखािगल बा । प्राकृतिक विपत्ति, वर्गीय विभेद, श्रम शोषण, कर्ठ ? समाजम नारी वर्गप्रति हेर्ना दृष्टिकोण सामाजिक विकृति र विसङ्गतिह चिरफार कैगिल बा । बुढनी उपन्यासम आइल पुरुष पात्र कोर्विन, अधिपति रज्वा, धर्माधिकारी, क्याप्टेन, कमाण्डर, सिपैह्या असक खल पात्रका रुपमा चित्रित बाट कलसे बाबा बघवा विद्रोही ओ अन्यायको लाग लर्ना पात्रके रुपम केयत सहयोगी पात्रके रुपम चित्रित बा । ओसहख सिमान्तकृत पात्र बुढनी, बाबा (सुर्या), डाइ (चुनु), बुढनीके संघर्या चाँद गाउँके मनै जुन गरिब निम्नवर्गके बट । शासक सामन्ती वर्ग हुनकन उपर गरिबी ओ परिस्थितिसे खेल्ठ कना बात वर्गीय विभेदह केरागिल बा । नारीप्रति हेर्ना नजरियाबारे फे अध्ययन कैगिल बा । आपन हक अधिकार ओ न्यायके लाग जन्नी मनै अप्नेहे सशक्त ओ जुझारु हुनुपर्ठा कना बातके वकालत कैगिल बा ।
शब्दकुञ्जी : राहा, नारीवाद, ढरमपोठी, पितृसत्ता, महिलाके पिरा
परिचय
साहित्यके विविध विधामध्ये आख्यानात्मक विधाके रुपमा स्थापित “उपन्यास” शब्द “उप” उपसर्गवादी पद पूर्वम हुइना “न्यास” शब्दके संयोजनमसे निर्मित हुइलक हो । यकर शाब्दिक अर्थ “समिप (लग्घु) मिलाक ढर्ना” बुझ्जाइठ । (सुवेदी २०५६, पृ. १) और व्यूपत्तिअनुसार “अस” धातुके आगओहर “उप” ओ “नि” उपसर्ग जोर्ख ओम्न “घञ” प्रत्ययके समेत सन्धि होकन बन्ना उपन्यास शब्दले “कौनो वस्तु वा विचारह लग्घ ढर्ना” कना अर्थवोध कराइठ । (बर्मा १९९५, पृ. १३६) तर साहित्य शास्त्रीय धारणाअनुसार उपन्यासके खास अर्थ जिबनमूलक विषयवस्तु वा जीवनसे सम्बन्धित विषयवस्तु यिहीम जिबनके यर्थाथ चित्र अङ्कित हुइल रहठ । स्पष्टः औपन्यासिक विषयवस्तु मानवीय जिबनसे सम्बन्धित हुइलक ओहर्से आधुनिक उपन्यास जिबन अनुरुप सत्यके प्रतिकात्मक अभिव्यक्ति हो । ( प्रधान २०४०, पृ.४) यह सन्र्दभम प्राचीन पूर्वीय साहित्यम उपन्यास शब्दके प्रयोग विविध अर्थम उपन्यास शब्द ढैख प्रयोग रहल पाजाइठ ।
साहित्यके विविध विधामध्ये एकठो विधा उपन्यास फे हो । आधुनिक साहित्यम महत्वपूर्ण स्थान अगोट्ख सर्वाधिक लोकप्रियता कमैल बा । यकर मुख्य कारण उपन्यासके रोचकता, वृहत जिबनके परिचय ओ सत्य आभास हो कह सेक्जाइठ । जिबन तथा जगत्ह बहुट लग्घसे हेर्ना, विश्लेषण, मूल्याङ्कन कर्ना ओ समाजके फोटोग्राफी कर्ना डगरम उपन्यास निरन्तर सक्षम र सशक्त रहल बा । थारु भाषा साहित्यम उपन्यास ओत्रा उर्वर नैरलसे फेन लिख्ना क्रम जारी बा । इन्दु थारुके लिखल बुढनी उपन्यास थारु भाषाम लौव प्रयोग हो ।
थारु साहित्यम उपन्यास लेखनम कम कलम चल्लक पाजाइठ । यि विधाम साहित्य सिर्जना एकदम कम बा । आख्यान विधाके अध्ययन करबेर तेजनारायण पञ्जियारके ‘शाक्य बुद्ध’ २०४९ म लिखल पाजाइठ कलसे मौलिक उपन्यास थारु साहित्यकार कृष्णराज सर्वहारीके ‘फुटल करम’ २०५५ म प्रकाशित पहिल कृति हो । कृष्णराज सर्वहारीके ‘थारु साहित्यके इतिहास’ २०७३ म प्रकाशित पुस्तकम जम्माजम्मी १० ठो किल उपन्यास प्रकाशित हुइलक तथ्य प्रस्तुत कर्ल बाट । असिक हेर्लसे थारु भाषाम उपन्यास लेखन कार्य कम हुइल पाजाइठ ।
इन्दु थारुके बुढनी उपन्यास नारीप्रधान उपन्यासके रुपम लिह सेक्जाइठ । उपान्यासकार थारू आदिवासहुकहनके सामाजिक, सांस्कृतिक ओ आन्दोलनके विषयम काम कर्ना अनुसन्धान कर्ता, अभियन्ता ओ लेखिका हुइटि । उहाँ सामाजिक सञ्जालम फेन नारीवाद, सिमान्तकृत समुदाय थारु समुदायके हक अधिकारके बारेम आवाज उठैटी आइल बाटि । आबक अवस्थाम थारु समुदायके सशक्त नारीवादी दृष्टिकोणसे समाजम समतामूलक बनपर्ठा कना आवाज फे उहाँक लेख रचनाम पाजाइठ । थारु समुदाय लगायत निम्न वर्ग, पिराम परल नारीहुकहनके आवाज उठैना इन्दु थारु साहित्यम लौव स्रष्टाके रुपम उडयीमान लेखिका हुइटि । आधुनिक थारु साहित्यिक क्षेत्रम सामाजिक, सांस्कृतिक ओ राजनीतिक विकृतिह यथार्थपरक ढङ्लगले विश्लेषण कर्ना आख्यानकार हुइटि । थरुहट क्षेत्रके थारुनके पिरा समाजक सुख–दुःख ओ किनारिकृत वर्गके कथा व्यथाह कलात्मक ओ निजात्मक शैलीम लिख्ना हुकाहार विशेषता हुइन् । उहाँ फुटकरम कविता गजल, खोजमूलक लेख रचनासे लेखनके प्रारम्भ कर्लसे फे पाछक चरणम उपन्यास विधाम कलम चलाक परगा डबैल बाटि । उहाँ लिखल सन् २०२५ सालम प्रकाशित बुढनी चर्चाम आइल पोष्टा हो । यह बुढनी पोष्टाके लैङ्गिक, वर्गीय दृष्टिकोणले विश्लेषण कर्ना प्रयास कैगिल बा ।
उद्देश्य
प्रस्तुत अध्ययनम नारीवादी सिद्धान्त ओ मान्यताके आधारम इन्दु थारुद्वारा लिखित बुढनी उपन्यासके आधारम समाजम रहल लैङ्गिक, वर्गीय सम्बन्ध, सामाजिक भूमिकाके बारेम पितृसत्तात्मक धारणा, नारीवादी चेतना र स्वतन्तत्रा, सङ्घर्ष आदि आधारम विश्लेषणात्मक रुपमा व्याख्या कर्ना मूल उद्देश्य रहल बा ।
अध्ययन विधि
यी अध्ययनम पुस्तकालय विधिके प्रयोग कैख गुणात्मक प्रकृतिके वर्णनात्मक ओ संश्लेषणात्मक ढाँचाम रहल बा । बुढनी उपन्यास प्राथमिक स्रोत ओ सन्दर्भ पुस्तक तथा अन्य विभिन्न लेख, अनलाइन सामग्री, जर्नल द्धितीय स्रोतके रुपम लेक विश्लेषण कैगिल बा ।
अध्ययनके सैद्धान्तिक आधार
नारीके पक्षम कैजिना वकालत नारीवाद हो । नारीके विरुद्ध लिङ्गके आधारम कैगिल भेदभाव, दमन, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक ओ वैचारिक शोषण विरुद्ध आन्दोलनके रुपम स्थापित चिन्तन नारीवाद हो । नारीवाद बहुट पहिलसे आन्दोलनके रुपम चलल आन्दोलन हो । बिसौँ शताब्दीके मध्यओहर आधुनिक साहित्यके सशक्त आन्दोलनके रुपम स्थापित हुइल पाजाइठ । नारीवादी आन्दोलन विशेषतः पाश्चात्य जगतके नारी प्रतिभाहुक्र महत्त्वपूर्ण योगदान डेलबाट । ‘नारीनके अस्मिता ओ मूल्यह केन्द्रम ढैख साहित्यिक लेखन तथा चिन्तनम केन्द्रित हुइना नारीवादी साहित्यिक चिन्तनके उद्देश्य हो ओ नारीनके उपर हुइटि अइलक सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, वौद्धिक शोषणके क्रमम नारी ओ नारीमुक्तिके पक्षधर ओहर्से नारीवाद तथा नारीमुक्तिसम्बन्धी चिन्तन देखा परल हो (बराल,२०६४,पृ.६४) ।’
नारीवादी आन्दोलनले नारीनके वास्तविक अस्मिता एवम् स्वतन्त्र पहिचानम जोड डेनाके साथ अनुभव, विचार, क्रियाकलाप एवम् गतिविधिह विशेष महत्व प्रदान करठ । महिलाके सम्बन्धम प्रस्तुत कैगिल विचार दर्शन ओ राजनीति नारीवाद हो । नारीवादह महिलावादके रुपम फे चिहिन्जाइठ । यी वाद पुरुषके तुलनाम महिला पाछ पर्लक ओहर्से महिलाके हित, रक्षाके लाग सङ्घर्ष करपर्ना धारणा रख्ल(ढर्ल) बा । महिला ओ पुरुषके बारेम समान दृष्टिम नाहोक महिलाके बारेम किल चिन्तन कर्ना नारीवादी दृष्टिकोण हो । यिहीले महिला फे पुरुषसरह अधिकार ओ अवसर पाइ परठ कना विचार आग सर्टि नारी पितृसत्ताके विरुद्ध सङ्घर्ष कर्ना अभिप्ररित करठ । (भट्टराई, २०७७, पृ.५) ।
असिक नारीके बारेम चिन्तन, विचार ओ विश्वास आस्था तथा सङ्घर्षके अवस्था इन्दु थारुके बुढनी उपन्यासम कसिक कैगिल बा ? यी उपन्यासम निम्ववर्गको वर्गीय सम्बन्ध, लैङ्गिक विभेद, यौनिकता, पितृसत्तात्मक सोच, शरीर, नारीप्रति समाजको दृष्टिकोण आदि बारे समेत अध्ययनम समेटगिल बा ।
लैङ्गिक अध्ययनके एक्ठो विषयके रुपम रहल नारीवाद जन्नी (महिला)सम्बन्धी विचार, दर्शन ओ राजनीति हो । नारीवादके महिलनके कोणमसे नारीहुकहन हेरठ ओ संसारभर महिलाहुकहन केन्द्र बनाक नारी(जन्निन्)के पक्षम बोल्ना लिख्ना काम करठ । नारीवादी लेखनले चाहिँ नारीके मूल्य मान्यताह स्थापित करठ (बराल, २०५२, पृ.१४०) । ओसहख जन्निन्के अस्मिता ओ मूल्यह केन्द्रम ढैख नारीके हक अधिकार, स्वतन्त्रताके बात नारीवादी साहित्यिक लेखनम भेटाजाइठ । नारीवाद जन्निन्उपर हुइना सक्कु प्रकारके शोषण, दमन ओ थिचोमिचोके विरुद्धम बा । यी एक्ठो बौद्धिक ओ व्यावहारिक आन्दोलन हो जुन सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक आदि अनेक पक्षमसे बोलठ, जिहिम असिन विचार, विश्वास, आस्था ओ आन्दोलन परठ । यिहीमसे जन्निन्के हितके विकासम सघाउ पुगठ कना ठान्जाइठ (गौतम, २०५९,पृ.३४४) ।
नारीवाद माहिलाहुकहन (जन्निन्) दोस्रो दर्जाके विरुद्धम कैजिना व्यवहारके विरोध करठ । महिला (जन्निन)के उपर हुइना दमन, शोषण, अन्याय, अत्याचार विरुद्धम मुक्ति कर्ना ओ नारी स्वतन्त्रताके पक्षम ठ्रिहाइक लाग आवाज उठैटी आइल पाजाइठ । महिलाप्रति कैजिना विभेदह अन्त्य कर्ना, जन्निन सबल, सक्षम ओ पुरुषसरह अधिकार ओ समानताके लाग आवाज उठाइक लाग, महिलाहुकहन केन्द्रम ढैख कृतिके अध्ययन विश्लेषण कर्ना समालोचना पद्धति नारीवादी विचारधारा मान सेक्जाइठ । यह विचारधाराके आधारम ‘बुढनी’ उपन्यासह विश्लेषण कर्ना प्रयास कैगिल बा ।
सामग्री विश्लेषण : प्राप्ति ओ छलफल
उपन्यासके कथानक
उपन्यासकार इन्दु थारुके लिखल ‘बुढनी’ सन् २०२५ प्रकाशित कृति हो । यी उपन्यासम लिङ्गीय (थारु जन्नी)के सम्बन्धह देखगिल बा । दुई खण्डम विभाजित उपन्यासके कथावस्तु रेखीय शैलीम लिखल बा । उपन्यासम पारिवारिक सम्बन्धह प्राकृतिक पंक्षी कौवाहे मानवीकरण कैक स्वैरकल्पनात्मक रुपम मानवीय सम्बन्धह प्रस्तुत कैगिल बा । पशुपंक्षीन पात्र बनाक समाजके यर्थाथताह चित्रण कैगिल यि उपन्यास सामाजिक उपन्यास हो ।
एकठो कौवाके छोटमोट परिवारके कथासे सुरु हुइल बा । उपन्यासके कथावस्तुअनुसार उपन्यासके मुख्य पात्र बुढनीके केन्द्रीयताम उपन्यासके घटनाक्रम अघारी बह्रल बा । कथाको घटनाक्रमअनुसार बुढनीक छोटमोट परिवार रहठ । जहाँ ओकर डाइबाबा बुढनी ओ ओकर भैया बहिनिया रठिस् । बुह्राइल डाइबाबासँग हुर्कल बुढनी ढिरेढिरे जवान हुइटी जाइठ । गाउँघरके लर्कनसँग खेल्टि सुखसे हुर्कठ मने कुछ समय पाछ डाइ आपन ठाँठेमसे निकारडेठिस् । ऊ आफन जिन्गिमे सङ्घर्ष आपन क्षमतासे उरे सेक ओ कुछ करे सेके कैक । जिबनम आइ पर्ना कठिन समस्या ओ चुनौतिसे कसिक बच्ना ओ जिना कना बुद्धि डाइ बुद्धि डेठिस् । ओठेसे ओकर जिन्गिक लौव मोड अइठिस् । ऊ जिन्गी जिए सिखेक लाग टर उपर खुब फोहैटि उरे लेकिन डाइ चिन्ता करिस् । चारुओर दुस्मन रठ , विचार कर परठ छाइ कैक डाइ सिखाइस् तर बुढनी एक कानले सुन्ख दुसर कानले उराडिह ।
बुढनी जब यहोरओहरके दुनिया संसार बुझ लागलठ उतब अकेलि बैठ्ना जिना महा कर्रा रलक बात महसुुस करठ । ऊ जिन्गीम सत्रु दुस्मनसे लरे सेक्ना सिपफेन सिक्टी गैल । डाइबाबक सिखाइल बात अर्ति जिबनम लागु कर सिकसेक्ल रह । ओकर भैया बाबु फे बहर सेक्ल रहिस् । आपन भैयाबाबुके फेन हेर चाह कर । ढिरेढिरे बुढनी सयान हुइटि जाइठ । एकदिन बुढनी खोल्ह्वाके घंघराम मछरिया पक्र ब्याला दुसर लवण्डा कौवा घंघराससे मछरिया झपोसके लैजाइठ । पैल्ह बहुट लवण्डा कौवासे ढेर रिसाइट तर पाछ यह घटनामसे कोर्विन लवण्डा कौवाके बुढनीक मिलभ्याट हुइठिस् । कालान्तरम लवण्डा कौवा कोर्विन ओ लवण्डि कौवा बुढनीक मैया प्रेम हुइपुग्ठिन् ।
अन्ततः बुढनी कोर्विनह मनरख्ना बनाइट । दुनुजने एक मन एक मुटु बन्जिठ । कोर्विन ओ बुढनीके प्रेम झङ्झङ्ग्यार हुइटि जैठिन् । पारिवारिक सम्बन्धम ठ¥वा मेह्र्वा बन पुग्ठ । हुकनक लौव घर अर्थात मिल्क सेम्रक रुख्वम ठाँठ बनैठ । कोर्विन फे बहुट खुश रहठ । एक दुसरके लाग जिउ एक बनल रठिन् । ठाँठम बुढनी चारठो आरा पारठ । घोरै बैसठ । टिनठो आरामसे बच्चा जन्मठिस् लेकिन एक्ठोमसे बच्चा हुइ नैसेक्ठिस् । डाइक मन बुढनी दुखी रहठ । ऊ ब्याला कोर्विनके मैया ओ और लर्कन्हक मैयाले दुख बिस्राइठ ।
कोर्विन ओ बुढनी दुनुजे आपन लर्कनके नाउ आरा, लिज्जि ओ मुस्वा नाउ ढर्ठ । दुनुजे आपन बच्चनके लाग आहारा खोजखोजके खवैठ । एकदिन कोर्विन लर्कनके लाग चाह्रा खोज गिल ब्यालम सेम्रक रुख्वा काइल बिखार सँप्वा बच्चन खाइक लाग गिल ब्यालम बुढनी ऊ सँपवासे लर्कन बचैना चुनौती रठिस् । रानपासके चिरै और कौवा हुके्र खुब चिल्लाइट तर सहयोग कर्नासे फेन तमासा ह्यारट् । ओह ब्याला उपर बद्रीम चिल्हरिया उरट देख्के बुढनीह और डर लग्ठिस् । ऊ दिन खुबसे चिल्लाइट ठोरले सँपुवाह टरे गिराइठ । पाछ फेनसे उपर रुख्वामे चिउह्र लागट टे चिल्हरिया उही झपोट्लेपठिस् । दुस्मनके घेरामसे बचसक लग्ठिस्, बुढनीह ।
कोर्विन ओ बुढनीक जिन्गीम खुसिक दिन ढेर रह नैपैठिन् । बहुट खडेरीके कारण असार महिनासम पानी नैपर्लक कारण बन्वाम बैठ्ना जिब जनावर, चिरैचिुरङ्गन, किरा फटिङ्गन जिना मुस्किल पर लग्ठिन् टिहुपर हुकनक बैठना बन्वाम आगलागि (राहा) लग्ठिन् । छोट छोट बच्चा रहल ठाँठम टैके आगि लाग कना बुढनीक बहुट धेर चिन्ता रठिस् । जिउँटिउँ बन्वाम आगि बुटठ । खडेरी बहर्टि जाइठ । कोर्विन लडियाम पानी लिह जाइठ् । बुढनी ढेर चिन्ताम रहठ् । कुछदिन पाछ राहा माठुर हुइठ् । बन्वाम बैस्ना सक्कु पशुप्राणीन् आहाराके विपत्ति पर्ठिन् । बुढनीके टिनठो लर्कन का खुवाउ, कसिक बचाउ कना समस्या अइठिस् । सारा बन्वा उजाड हुइल रहठ् । ढेर दिन पानी नैपरठ । खडेरीले बहुट भुखाहि पर्ठिन् । हुकनक लाग प्रकृतिफे भयावन चुनौती बन पुग्ठिन् ।
यह क्रमम कोर्विन महादुर आहरा खोज निक्रठ् । यहर खाइ नैपैलक कारण भुखहि पर्ख मुस्वक ज्यान जिठिस् । बुढनीह आपत पर्ख करु ट का करु कुछ खैनापिना निहो, छटपटाइठ । मनम पिर बठ्ठाले बुढनी खोब रुइठ् । का कर्ना प्रकृतिके लीला सहनाबाहेक दुसर उपाय नै रठिस् । मुस्वाहे आपन ठाँठमसे भुइम गिराइट । कोर्विन चारा (आहारा) खोज गैल लेकिन घुमके नैआइठ । बुढनी अप्नेहे दुर द्र लडियासम आहारा खोज जाइठ मुले ऊ खालि घुमके आइठ् । कोर्विन समयम आहारा लेके नैअइलकमे बुढनीह विश्वासघात करलसक लग्ठिस् । मुस्वा मुलक पाछ भारी वर्ष हुइठ । बन्वाम रहल चिरै चुरुङ्गा जियाभरके पानी पिए पैठ । पानीसँगे बरवार आँढिबौखा अइलक कारण बुढनीकउपर दुसर चोट ठप्जिठिस् । आँढिबौखाके कारण ओकर छावा आराके ज्यान जैठिस् । पिरा उपर पिरा सहनाबाहेक और कुछ उपाय फे नैरठिस्, बुढनीक । आप ठाँठम लिज्जि ओ बुढनीकेल रैजिठ । आपन डाडु भैयाके मृत्युपाछ लिज्जिक जिना मन नैलग्ठिस् । आरा ओ मुस्वाके मृत्युले बुढनी बहुट सोचमे परल रहठ् ।
कोर्विन तिन दिन पाछे बिहान घुम्क आइठ् । आपन बाबाहे देख्ख लिज्लि रुइ लागठ । डाइ आहरा खोजे गिल रहठ् । बुढनी फे ठाँठमे एक्ठो चमगेन्द्रिक टुक्रा लेके आइठ् । कोर्विन बुढनीक उपर बहुट रिस उठल रठिस् लेकिन दुनुजे लिज्जिहे मैया कर्ठ । बुढनी दोसर ठाँठ बनैना सोचट । फेनसे लर्का जन्माइ सेकब कना बात कोर्विनसे ढरट् तर कोर्विन बर कर्रसे झोक्काइट् । चार मन्से एकठो किल बचैलो । कोर्विन बुढनीक उपर रिस पोखट । डुनुजहनके वादविवाद हरदिन झग्राझाँटि हैमस चल लग्ठिन् । कोर्विन आहरा खोजे गैलम बुढनी उपर का समस्याले बिटैल रठि ऊ केवल लिज्जि ओ बुढनीह किल पता रठिन् । कोर्विन बुढनीक उपर आपन रिस डेखाइ लागठ । मोर लर्कन नानडेउ कैक बुढनीह तनाव डिह लागठ् । कोर्विन बुढनीक पिरा बुझ्ना कोसिस नै करठ् । अत्रासम कि बुढनीह लिज्जिक लग्गे पर नै डेना । रोजदिन बुढनीह गरैना, मार छुट्ना, डुरैटि रना कर लागठ् , कोर्विन । कोर्विन असिन दुव्र्यवहार, अत्याचार ओ पिरा सह नासेक्क बुढनी कुछ डुर चलजाइठ् ।
बहुट भोहर मन लेक दुर गैल बुढनीक केयटसे भ्याट हुइठिस् । केयटह बुढनीक उपर का बिटल बाटिसे कना सब पता रठिस् । बुढनीह केयट सल्लाह डिहट । आपनउपर हुइल अन्यायके विरुद्धम न्यायके लाग रज्वकठे जैना सुझाब डिहट तर बुढनी नैमानठ् । बुढनीक सोच कोर्विनहे नामुवाइटसम अप्न नैमुना बरु रज्वकठे नैजैना विचार रठिस् । करिब तिन चारदिनसम केयट बुढनीह सम्झाइट त बल्ल बुढनी रज्वकठे जैना मन बनाइट । केयटसे सँगे खोल्ह्वा, लडिया, बनबनेट, मनैनके बाली लागाइल खेट्वा, बस्टि हेर्टि रज्वक डरबारम पुग्ठ ।
ओहर रज्वक राजसभाम बहुट मनै, चिरै, किरा, फटिङ्गा, केस्ना आपन आपन पिर बठ्ठा लेक उजुर कर पुगल रठ । रज्वक राजसभाम सबजहनके बयान लेटि धर्माधिकारी ढरमपोठी (किताब)के आधारम फैसला सुनाए ।
ढेर मनैनके पाछ बुढनीक पाल्या अइठिस् । रज्वक एक्ठो सेना कोर्विनह बलाए जाइठ् । जब कोर्विन ओ लिज्जि डुनुजे अइठ । लिज्जि चिल्लाइठ डाइ कैक । बुढनी ढेर दिन पाछ लिज्जिहे देख्लक ओहर्से आपन मन ठाम्ह नैस्याकट ओ लिज्जिहे उक्वारभर लेहठ । छाइडाइके मिलभ्याटले खुसी हुइठ । तर कोर्विन भारी सभाम फेन गँुन्जरटि लिज्जिक लग्घ गैलकम रिसोट्ल बुढनीह ठोरले खोट्क लागठ, छाटि चिठट् । केयट डुनुजहनके झग्रा छुटाइट । केयत कोर्विनके उपर रिसोट्ल झपारट् ।
रज्वक धर्माधिकारी कोर्विन ओ बुढनीह अल्गे अल्गे लैजाइठ । बयान लेके सेक्क कोर्विन बिया डरुइया हो, टोहार छाइक उपर अधिकार नैहो । लिज्जि कोर्विनके लागि कैक कहट । बुढनी असिन अन्यायपूर्ण निर्णयके विरोध करठ । कोर्विन बिया डरुइया हो कलसे मै खेट्वा नै हुँ मै त डाइ हु मोर लर्का अनाज नैहो मोर छाइ हो । यी गलत हुइल कहठ् । तर रज्वा ओकर बात सुन्ना पक्षम नैरहठ । बुढनीक पक्ष लेक केयट फे ‘महाराज जि यि न्याय नैहो’ बिरोध करठ । उल्ट टैँ किताबक उपर बात उठैठे कैक सभासे बहार निकार डेठिस् ।
सभामे अधिपति आपन सेनाहे उजर चाउरके घेरा बनाइ लगाइठ ओ कहट ‘लिज्जिहे के ढेर मैया करठ यि घेरासे लिज्जिहे ढरो ओ आपन आपन ओर टानो’ कहठ् । कोर्विन ओ बुढनी लिज्जिह आपन आपनओर तानिक ताना कर लग्ठ । यहर लिज्जिक लाग लराइ कराक धर्माधिकारीहुक्र मजाक उरैठ । बुढनी रिस ठाम्ह नासेक्क धर्माधिकारीह ठोरले नोछे जाइठ् । धर्माधिकारी किताबले मर्ठिस् बुढनी रक्तरोहन हुइट । रज्वक सभाके करल फैसलाले बुढनी भरोसा उर जैठिस् । उही सभासे बहार फकाडेठिस् । बुढनी बेहोसीम बर्बरैटि ‘मोर लर्का डेउ मै डाइ हुँ ।’ बुढनी घायल हुइ रहठ तब्बेहे एकठो मनैया उठाक लैजाइठ् । ओकर कौनो सन्तान नैरठिस् उही छाइ बनैना विचार करठ् ।
उपन्यासके डुसर खण्डमे घहिल हुइल बुढनीके कारुणिक कथावस्तु बा । रज्वक दरबारसे हुइल फैसलासे अन्यायम परल बुढनी बेहोसी रहल अवस्थामे एकठो दयालु परिवारके डाइबाबा उठाके छाइ बनैना उद्देश्यले सेवासुसार कर लैगिल पाजाइठ । जुन परिवारम आपन लर्कापर्का नैरलक कारण बुढनीहे आपन लर्कासक मलमपट्टि कर्ठ । बेहोसी अवस्थाम फेन बुढनी रज्वा, धर्माधिकारी उपर बदलाके भावना जग्ठिस् । डाइबाबक स्याहार सुसारले बुढनी टङ्रटि जाइठ् । बुढनी चुम्मर हुइटि जाइठि त एकदिन बाबा कठिस् –‘आबसे महिन बाबा कहहो ।’ डाइ फे महिन डाइ कहहो कैक कठिस् । डाइ बुढनीह मैयाले चुनु नाउ ढैडेल रठिस् । बुढनी ठनिक सनच हुइट ओकर पुरान गोही केयट भेट कर अइठिस् । बुढनी मजासे बोल सेक्ना अवस्थाम नैरहट् । बुढनी कहट–‘मोर पख्ना उख्रल बा, गोरम चोट लागल बा, ठोर टुटल बा । यि घरक मनै महि सेवा सुसार कर्ठ । मै सनच हुइम टे टुहारठे अइम् ओ लिज्जिहे खोज्बि ।’ केयट बुढनीक बात मजासे नैबुझठ् ओ भेट्ख चलजाइठ् ।
बुढनीह ओह मनैन्के घरम बैठना कर लग्ठिस् । उ मनैअसक झुल्वा फे घालठ् । उहीह गाउँक मनै सबजे चट्टुर लवण्डि कठिस् । सेवा सुसार करल ओह डाइबाबाके मैयाले बुढनीह जिना आस पह्लैठिस् । बुढनी पैल्हसक उर नैसेक्ना हुइल रहठ् । बुढनी बैठ्ना घरम एकठो गैया पल्ल रठ । जेकर नाउ गोम रठिस् ऊ एकदिन बछरु जन्माइट् । ऊ बछरुक नाउ बुढनीक डाइबाबा चाँद ढैडेठिस् । अकेलि महसुस कर्ना बुढनीक आब चाँद संघर्या बन्जिठिस् । चाँदह हेरचाह ओह बुढनी करठ् । बुढनी लग्घक बनुवाओर डर्वाम चाँदह चह्राए लैजाइठ । ऊ ब्याला बाबा बघवासे भेट हुुइठिस् । बुढनी ओ चाँद खुबसे डरैठ लेकिन बाबा बघवा चाँद छोट हुइलक कारण कुछ नैकरठ् । चाँद ढिरे ढिरे बहर्टि जाइठ । एकदिन गाउँक एकठो किसन्वक लाहि खाइठ् । किसन्वा बहुट कर्रसे रिसाइठ ओ बाँसक लठ्ठीले महा जोरसे पिटट् । बुढनी रोइ लागठ । आब नापिटो कैक अर्जि करठ । घर पुगलम बुढनीक मन भोहर हुइल रठिस् । डुसर बिहान्नी किसन्वा बरघरसे कचेहेरी बलाख बुढनी ओ चाँदके बारेम छलफल कराइठ् । बछ्वाहे बेचो ओ लवण्डिक भोज कैडेउ कहट् । तर बुढनी यि बातम घोर बिरोध करठ् ।
उ दिनसे बुढनी चाँदहे जेकरटेकर बालीम है कर्ना पैस्ना काम कर निडेहट । ओह दिनसे बुढनी बन्वक लग्घुच चाँदहे चह्राए लैजाए । बाबा बघवासे बुढनी भेट हुइठिस् । चाँद ओ बुढनी डरैठ । बाबा बघवा कहट् । चाँद मजासे ठुल्हाइल नैहो, मोर खैना लायक निहो छुट्की कौवा बाबु कैक टिबोली मारठ् ।
एकदिन रज्वक सिपैह्या गाउँक बन्वाम दिउटन बली चह्राइक लाग उज्जर मुस्वा पक्र गैल रहठ् । उ सिपैह्या बाबा बघवक फ्याला परठ् । बाबा बघवा सिपैह्याहे मारक लाग रहठ, बेस्मारी डक्ल्याइट् । यहाँसे भाग नै टे टोर मु फे खाडेम कैक चेतावनी डिहट् तर सूर्या यि रज्वक मनैया हो कहट् त सिपैह्यक ज्यान बच्ठिस् । खँढ्राम रलक उज्जर मुस्वा बुढनी खोल्डेहट् । मुस्वा खोब खुसी हुइटि आपन घरओहर फुन्नैटि जाइठ् । उज्जर मुस्वा आन नैसेक्लकम फेनसे रज्वा क्याप्टेनके कमाण्डरम उज्जर मुस्वा पक्र अइठ तर निभेटैठ । गाउँम बुढनीक बाबक घर जाक मुस्वा भगैना बुढनी हो कहट् । क्याप्टेन बुढनीहे दरबार जाइ पर्ना आदेश करठ् । सिपैह्यक ज्यान जोगैनु उल्ट यहाँ बदला लिह आइलबटो कैक बुढनीक बाबा रिसाइट् । मोर छाइह महिसे डुर कराइटो कैक विरोध करठ् । क्याम्टेन बुढनीहे छोरके बाबाहे पकर्ख लैजैठ । एक अठ्वारसम कुछ अत्तापत्ता निहुइलक कारण गाउँक बरघर सहर जाइठ, ओह घुम्ख नैआइट् । यहर डाइ ओ बुढनी सोचमे परल रठ । बुढनीक डाइ चिन्ता करिस् । घरम सुखशान्ति हेराइल रठिन् ।
एकदिन बुढनी अप्नेहे सहर जैना विचार करठ् । बाबा बघवा सहर नैजैना सल्लाह डेठिस् । सहरम कपटी मनै किल बाट टुहिन माटिम किचुलके मारसेकही, टुहार इज्जत मेटैही, नाजाऊ छुट्की कौवा बाबु । तब्बु फे बुढनी हिम्मत कैक रज्वक दरबार जाइठ् । उहिह दरबारम धर्माधिकारी पुछ्ठिस् । टुहि भित्रर के पैस डिहल ? टु के हुइटो ? उहाँ सभामे गाउँक बरघर फे रह । यि त सूर्याके छाइ हुई, बरघर बटाइल । बुढनीक बाबाहे दुईजे भाला लेले लेक अइलिस् । बुढनी आपन बाबाहे लिह आइल बटाइट् । धर्माधिकारी खिट्रायसक हाँसट् । कुल डेउटन चह्राइक लाग उज्जर मुस्वा नैहुइलक ओर्से पूजा बिग्रलक कारण सूर्याह जेल जाइपर्ना फैसला अधिपति सुनाइठ् । यि न्याय नैहुइल कैक बरघर अधिपतिक निर्णयके विरोध करठ ।
खँढ्रामसे उज्जर मुस्वा भगैना मै हुँइटु, बुढनी कहल । यहाँ उज्जर मुस्वा काखर चाहल ? यि कसिन नियम हो ? हमार बन्वाम असिन निहुइट् । अधिपति हाँसट्, टुहार बन्वा । बुढनी झोक्कैटि ‘हाँ, हमार बन्वा जहाँ हम्र डिउटन झाला, पट्या, फुला चह्राख पुजा पुज्ठि । बिना पुज्ल ना बइर, ना बन्कस या भुवा न सिकार कुछ नै नन्ठी ।’ तर धर्माधिकारी ओकर बात नैमानठ् । सभाम उपस्ठिट रहल गाउँक बुह्र्वा बोलट ‘हम्र गाउँम ढेर मिहिनेत कर्ठि, अनाज फरैठि । बड्रिमसे पानी बर्सठ, कभुकाल हमार खेट्वा लैजाइट ऊ ब्याला टुह्र कहाँ रठो ? जहाँ टुन्हक कानुन नैहो उहाँ हकडक फे नैहो ।’ कति बिरोध जनाइठ् । कमजोर मनैन हटाइक लाग भारी मनै नियम बिगर्ठ । ढेर विरोधके कारनसे बाध्य होक सूर्याह छोर पर्ठिन् । बरघर, बुह्राइल चौधरिया, सूर्या ओ बुढनी घर ओहर घुम्ठ । यि घटनाले बुढनीक चारुओर चर्चा हुइठिस् ।
गाउँम सबजे मिल्क बर्खैह्या कुल्वापानीक लाग कचेहेरी कर्ठ । बुढनीक बाबा गाउँक कुल्वापानीक लौव बरघर बनठ । गाउँक मनै मिल्क कुल्वा मुरा सओर्ठ । बर्खा ओराइठ् । अनाज बाली फे मजा फर्ठिन् । मजा बालीनाली हुइलक कारण सब गाउँक मनै खुस रठ । माघ आइठ, माघम सबजे रमैठ । माघक एक अठ्वार पाछ रज्वक सिपाही बहुट ढेर घोरी, हाठहठियारसहित लह्र्या लेक गाउँम अनाज उठाए आइल रठ । गाउँक मनै सबजे कर टिर्ल रठ । तब्बो फेन सिपाही अनाज लैजैना अडान कर्ठ । गाउँक मनै बिरोध कर्ठ । एकठो बुह्र्वा रसिद डेखैटि कहट ‘हम्र कर टिर्ल बाटि । आब का ख्वाजटो ?’
सिपैह्या कहट ‘जवाफम ऊ त पुरान नियम हो । असौ बहुट अनाज उब्जैल बाटो । यि खालि लह्र्या भराऊ बराबर हुई ।’ गाउँक एक जवान बोलठ ‘यि त हम्रहिन मारा परि’ बात सुन्टिकी सिपैह्या कोर्रा लगाइक लाग रहठ ते बुढनीक बाबा रोकठ् । एकठो बुह्र्वा गाउँक मनैन सम्झाइठ् । लुटल अनाज मै आनम टुह्र घर घर जाउ कहठ् ।
सिपाहिनके टोली लह्रर्या लेक बाबा बघवा बैस्ना बन्वा हुइटि जैठ । यि बात बाबा बघवा पत्ता पैल रहठ् । रातिक समयम बाबा बघवा सिपाहिनके डफ्फाम आक्रमण करठ् । कैयौ सिपाहीनके ज्यान जैठिन् । ओहर रज्वकठे गाउँ हुइलक घटनाके खबर पुग्ठिस् । भागाभाग हुइठिन् । लह्र्या बिल्टठिन् । यि बात सूर्याहे पता हुइठिस् । ओहमार उ आपन छाइ बुढनीह बाबा बघवाह भेट कर पठाइठ । रातिक समयम बुढनी बन्वा पुगठ ओ बाबा बघवासे बातचित करठ् । बाबा बघवा सिपाहिन्से लराइ कर्लक कारण घहिल हुइल रहठ् । बाबा बघवा बुढनीसे ढेर बात करठ् । मनैन्के लोभ लालचीके बारेम अरठ डिहट् ।
ओहर रज्वकठे गाउँम हुइलक घटनाके खबर पुग्ठिस् । लह्र्या बिल्टल, नोकर घायल हुइल खबरले रज्वा थप सौठो सिपाहिन्के टोली पठाइल । बाबा बघवाके बैस्ना बन्वाम घेरा डर्ठ लेकिन पत्ता लगाइ निसेक्ठ । करिब एक महिनापाछ रज्वक सिपाही गाउँ छोर्क जैठ । डुसर महिनाओहर बुढनी बन्वाम जाइठ तर बाबा बघवाके भ्याट नै हुइठिन् ।
रज्वक कमाण्डर बाबा बघवा बैस्ना बन्वाके आसपासम डरवाम लौव बस्टि बैसाइट् । गाउँ ऊ चौर खुला सझ्या रहठ् । बनके जिब जिन्वार गाउँक गोरु बछरु चहर्ना करठ् ऊ ठाउँम । लौव बस्तीक मनैया एकदिन उ डरवा ज्वाट भिरल रहठ् तब्बेहे बुढनी किसन्वासे ठोलिबोलि हुइठिन् । पुरान बरघर फे किसन्वा उपर बिरोध करठ् । ‘यि डरवा गाउँक सझ्या हो, बन्वक जिबजनावर फे चहर्ठ । बालि लगाइक लाग खेट्वा बनाइ निसेक्जाइ ।’ कैक किसन्वाह दबाब डिहट् । लौव बस्टिक मनै रज्वक ठे उजुर कर जिठ । तर रज्वा तत्काल सिपाही निपठाइट् । बुढनी लौव बस्टिक मनैनके आँखिक किरकिट् बनल रहठ ।
रज्वा लौव बस्टिक किसनोन पचास ठो गैया डेहट् । रज्वा पुरान बस्टिक मनैन कमजोर बनैना रणनीति बनैल रहठ । डाइबाबा बुढनीह रज्वक शोषण सामन्तीपनके बारेम सिखैठिस् । रज्वा एकठो मुरट हो । ओकर धर्माधिकारी, कमाण्डर, वकिलनके माध्यमसे लुट्ना एकठो सामन्ती वर्ग हो कना बटोइठ । बुढनी चाहिँ कसिक रज्वा अधिपति, धर्माधिकारीसे बदला लेना सोच ओ भित्र भित्र योजना बनैटि रहठ । लौव बस्टिम डिहल गैया किल रलहिन् । एकठो फे बछ्वा अर्थात बर्ढा नैरलहिन् । बुढनी आपन चाँदहे हुकहनके गैयासे लग्घ ह्वाए नेडह । किसान करिब एक बरस गैया पल्ठ, पानी पिवैठ । गोब्रक घुरौराबाहेक कुछ नैमिल्ठिन् । गाउँक डरवाम गैया चह्राए गैल ब्याला चाँद गैयनसे छेह्वारी लागठ । सब गैयन कुछ समय पाछ बछरु पैठ । लौव बस्टिक मनै बहुट खुस रठ । गैया डुढ डिह लग्ठिन् ।
करिब तिन महिना पाछ बुढनी गाउँक सारा बछरु नुकाक रातिक समयम घरसे भागठ ओ चाँदह फे सँगे भगाइठ । यि बात लौव बस्तीक मनै पता पैठ त बुढनीक पर रिसेटि बुढनीहे मारेक टन खोज जिठ । लौव बस्टिक एकठो मनैया आख्खरके बोलल त बुढनी फे मुक्का पार्के मुक्याडेहम कैके हिम्मत करठ् । लौव बस्टिक मनै बुढनीहे चोर डेखैटि । हमार बछरु फिर्ता डेऊ कैक बुढनीक पख्रा पक्रठ तर बुढनी एक्को नाडराक बेर्वा लजरले ह्यारट् । सारा रिसक मार लाल हुइल रठ । बुढनी रज्वक दरबारमे पुग्सेक्ल रहठ । उ आपन न्यायके लाग अधिपतिसे निवेदन करठ् । हिक्र चोर हुँइट । उल्ट महि चोरि लगाइट । ओहमार न्याय खोज यहाँ आइल बटु ।
लौव बस्टिक मनै बुढनीहे पचासठो लौव बछरु चोरैलक आरोप कैयो चो डोहो¥या डोहो¥या कहटलहिस् । बुढनी नि डराके कहठ्– बछरुके डाइ केहो ? महि पता नैहो । यि सब बछरुके बाबा मोर चाँद हुइलक कारण सारा बछरु मोर हुइट । कानुन सबके लाग एक हुई काहु । यिहिसे आघ एकठो कौवा डाइ आपन बच्चाके लाग न्याय माग आइलम टोहनके ढरमपोठी कानुन बिया डरुइया बाबा हुइलक कारण बच्चा बाबक हुइलक फैसला सुनैलो । एकठो डाइक आपन लर्का अछिनगिल रह । उ दिन कलहो कि लर्का बाबक लागठ । आज यि सब बछरुन्के बाबा चाँद हो ओहमार सब बछरु मोर हुइट ।’
बुढनीक बातले लौव बस्टिक मने खुसफुसाइ लग्ठ । धर्माधिकारी अन्कनाइठ ओ ठर्ठराइठ । मै ओह बुढनी हुइटुँ । केक्रो डर ढम्किले नैडरैठु । बुढनी ऊ किताब लब्डाइल धर्माधिकारीक नाकेम लागखन छिट्राबिडिन् हुइठ । ऊ किताबके पन्नामे कुछ अक्षर नैरहठ, पियर रङके पन्ना ऊ बिटोर लागठ । ओकर नाकेमसे रकट पन्नामे चुहटि जैठिस् ।
केयट ओ बुढनीक छाइ डरबारम पुग रठ । टोहनके ऊ किटाब झुठके हठियार हो कैक लिज्जि अधिपतिह कहठ । ऊ टरेसे उपर मुन्टि नैकराइट् । छाइडाइनके ओ केयतसे उक्वारभ्याट हुइठिन् । बुढनी लौव बस्टिक मनैन कहट ‘मै ओत्रा निच नैहुइटुँ जत्रा महिन टुह्र सोच्ठो । डाइसे लर्कन अलग करैना पिरा महि पता बा । टुहनके बछरु टुहिनके घरक लग्गे नुकाइल बटा । बन्वामे जहाँ बाबा बघवा वेपत्ता हुइल रह । बछरुन् ओइनके डाइकठे लैजाऊ ।’ बुढनीक बात सुन्के लौव बस्टिक मनैनके अन्हार अजरार हुइठिन् । बड्रि करिया रहठ एकघचिक आँढिबौखा आइट पानी बर्सट । सारा मौसम सफा हुइठ । रुख्वा बरिख्वा फट्कारसे डेख्गिल । चाँद, लिज्जि ओ बुढनी घरओर नेँगल कर्ठ ।
जन्निन्उपर शोषणके पितृसत्तात्मक स्वरुप
यि उपन्यासम कोर्विन ओ बुढनी बिच पहिल मजा घरबार चल्लसे फे बच्चा हुर्काइ बेर प्राकृतिक विपत्तिके कारण आहराके कमि भोकमरीके कारणसे जब कोर्विन आहारा खोज जाइठ् । कोर्विन समयम आहारा लेक आइ निसेकट । यहर बुढनीह आपन लर्कन का खुवाऊ कसिक बचाऊ कना बहुत सासट हुइठिस् । ऊ घटना बहुट कारुणिक बा । भुखाहि पर्ख मुस्वाके ज्यान गुमाइ पर्ठिस् । आँढिबौखा पानीक कारण आराके जिबन लिला समाप्ट हुइ पुग्ठिस् । आहारा खोज गिल कोर्विन तिन दिन पाछ आहारा लेक आइट त डुइठो लर्का मुवल थाहा पाइट् । ओठसे सब दोष जन्नी बुढनीक उपर लगाक गरैना, नैबोल्ना, बाँचल एकठो छाइ लिज्जिकठे लग्घु आइ निडेना । अत्रासम कि सिधे ठोरले चिठ जिना, हर रात हरदिन गारी भुवा किल कर्ना काम कोर्विन कर लागठ । बुढनीक उपर घरेलु हिंसा, मानसिक तनाव डिहट, असिक उपन्यासम पितृसत्तात्मक स्वरुप पाजाइठ ।
वास्तविक परिस्थितिक बात बिन बुझ्ल जन्निक उपर अन्याय अन्याचार कर्ना काम कोर्विन करठ । यि एकठो पितृसत्तात्मक लैङ्गिक शोषणको मूल स्वरुप हो । ‘पितृसत्ताले आर्थिक, वैचारिक, कानुनी, सामाजिक आदि संरचनाके माध्यमसे अप्नह बल्गर बनैनाके साथ जन्निनम मनैनम आत्मविश्वास जाग निडेहक लाग अनेकौ प्रपञ्च कर्ठ (पौडेल,२०५९, पृ.८३) ।’ पितृसत्तावादी सोच घरसे लेक राज्यक हर निकायम हाबि बा कना बात बुढनी उपन्यासम कोर्विनके घरेलु हिंसाम परल बुढनी न्याय ड्वार ढकढकाए गिलम अधिपति , धर्माधिकारीसे फे न्याय पाइ निसेक्ल हो ।
बुढनी निर्भिक निडर रलसे फे लैङ्गिक मूलभूत मान्यता पुरुष (ठर्वा) के आघ जन्नि मनैनके कुछ नैलागठ कना डेख्जाइठ । जन्नि मनैन वासना पूर्ति ओ लर्का जन्मैना साधन सम्झना ओ जन्निनके पिरा मातृत्व प्रेमके कुछ ख्याल नैकर्ना कोर्विन भारी सभा डरबारम फेन बुढनीह नोछे जाइठ । ओसहख न्यायके तराजु बोकल डरबारमे अधिपति, धर्माधिकारी, वकिल सबजे विषयके वास्तविक गहिराइ ओ यथार्थ बिन बुझ्ल मुँह हेर्क फैसला कर्ना नारीप्रतिके बर्खिलापम निर्णय हुइल डेख परठ् ।
कोर्विन ओ बुढनी सँग जिना सँग मुना कसम खाइल जर्मक जोर्या बुढनीह दुःखी अवस्थाम धोका डेना कामले पितृसत्ताके ढङढङी समाजम रलक यथार्थ प्रस्तुत कैल बा । मुवल लर्कनके वियोगम छट्पटाइल जन्निह मनक पिरा कम कराइ छोर्क मानसिक एवम् भौतिक आक्रमण कैक हिंसा कर्ना लैङ्गिक भेदभाव हुइल पाजाइठ । जन्नि मनै सद्द उत्पिडित हुइ पर्ना, हुक्र नै पुरुषके भोग कर्ना साधन बन पर्ना, पुरुषके आघ समर्पित हुइ पर्ना वैचारिक दृष्टिकोण उपन्यासम आइल बा ।
यि उपन्यासके मुख्य पात्र बुढनी हुई । बुढनीके केन्द्रियताम उपन्यासके घटनाक्रम आघ बह्रल बा । यि उपन्यासके मुख्य पुरुष पात्र कोर्विन हो । लिङ्गके आधारम पुरुष पात्र, कार्यके आधारम मुख्य पात्र, निम्न वर्गीय पात्रके आधारम मूल्याङ्कन कर सेक्जाइठ् । ओसहख केयट सहायक नारी पात्र हो । कोर्विनके पुरान संघर्या पाछ समयम बुढनीके सुखदुखम साथ डेना सहयोगी पात्रके रुपम चित्रित बा । अन्याय अत्याचार, दमन शोषणके विरुद्धम रज्वक डरबारम न्यायके लाग बुढनीह साथ डेना अविवाहित पात्र हो । अन्याय ओ अत्याचारके विरोधम बोल्ना पात्र हो । डरबारम कोर्विन बुढनीह ठोरले खोट्क ब्यला फे झग्रा छुट्यैना ओ कोर्विनहे डक्लैना काम समेत कर्ल बा । डरबारम लिज्जिक लाग एकठो डाइ पिरा बुझल पात्र धर्माधिकारीके विरुद्ध आवाज उठैना पात्रके रुपम चित्रित केयत सहयोगी पात्र हो ।
धर्माधकारी, अधिपति पुरुष हुइलक कारण निम्नवर्ग नारीप्रति न्यायिक सहि फैसला नैकर्ठ यि पुरुषप्रधानके अवसेस घरम केल नाहि न्याय डेना ठाउँम फे बा कना बात उपन्यासम सशक्त रुपम डेखा परठ । डरबारम ठारु ओ जन्नि, मुस्वा ओ मैना, हरना ओ घोटरिक घटनाके मुद्दाके फैसलाम नारी पुरुषके कारणसे न्याय नैपलक ओ हिंसाके सिकार हुइ पर्लक घटना उपन्यासम आइल बा ।
धर्माधिकारी, अधिपति जबरजस्ती बुढनीह दोषी करार कैक आपन छाइसे रहना बैस्ना, पालपोस कर्ना, मैयासे वञ्चित करैलक पाजाइठ । समाजम शिक्षित वर्ग, ठूलाबडा, शासक वर्ग अप्नह उच्च कहुइया समाजम निम्न वर्ग, सिमान्तकृत वर्गउपर थिचोमिचो, अन्याय, अत्याचार शोषण कर्ठ कना बातह प्रष्ट रूपम डेखगिल बा । निम्न वर्ग, सिमान्तकृत, निमुखा वर्गन कमजोर पारक लाग उच्च वर्गक मनै नियमके पालना नैकर्ठ । उल्ट नियम विगर्ठ कना बात यि उपन्यास वर्गीय दृष्टिकोणसे गरिब दुखीप्रति सहानुभूति प्रकट करल पाजाइठ ।
बुढनी उपन्यासम नारीवादी चेतना
बुढनी उपन्यासके घटनाक्रम प्रायः बुढनीके केन्द्रीयताम अघारि बह्रल बा । लिङ्गके आधारम जन्निपात्र, कार्यके आधारम मुख्य पात्र, जीवन चेतनाके आधारम प्रतिनिधिमूलक सचेत, क्रान्ति जुझारु पात्र, स्वाभावके आधारम गतिशील पात्रक रूपम डेखजाइठ् । लैङ्गिक चेतनाके माध्यमसे नारीवादी सचेतना प्रस्तुत कर्ना काम उपन्यासम नारी पात्र बुढनीके माध्यमसे हुइल बा ।
बुढनी निम्न वर्गके हुइलसे फे ऊ सुरुसे गतिशील, विभिन्न समस्यासे कसिक आघ बह्र परठ् कना ज्ञान आपन डाइबाबासे प्रशिक्षित पात्र हो । बहर्टि उमेरम मैया प्रेमम पर्ख विवाहित होख पारिवारिक बन्धनम बाँढल पात्रके रुपम डेख्जाइठ् । कोर्विनके मैया पिरिमम परल बुढनी अन्ततः भोज करठ् । कोर्विनह जिबन साथीके रुपम स्वीकर्ना, अंशिह्या हुइलम आरा पार्ख घोरै बैस्ख बच्चनके जन्म डेक हेरचाह कर्ना, आपन लर्कनके लाग आहराके बन्दोबस्त कर्ना ओ जसिन परिस्थितिम फेन प्रकृतिसे जुझ्टि सङ्घर्ष कर्ना विचार ढर्ना कलक नारी चेतनाके प्रकटीकरण हो ।
उपन्यासम कोर्विन ओ बुढनीक चारठो आरामध्ये टिनठो बच्चा आरा, लिज्जि ओ मुस्वाके जनम हुइल रठिन् । लम्मा समयसम पानी नापर्ख खडेरीके कारण हुकनक बैस्ना ठाउँके बन्वाम आगलागिके कारण विपत्ति हुइ पुग्ठिन् । खैना आहारा नाहोक भोकमरी पर्ठिन् । ऊ ब्याला एकठो परिवारम डाइ ओ बाबक भुमिकाह डेखगिल बा । कोर्विन लग्घु चाह्रा नैमिल्ना कारण महाडुर आहारा खोज जाइठ् । आहरा समयम नैअन्लक कारण भुखाहि पर्ख मुस्वाके ज्यान जैठिस् । बुढनी यहरओहर स्याकटसम आहरा खोजट् तर निपाइठ ।
डुसर दिन बराभारि आँढिबौखा पानी बर्सठ । आँढिबौखाके कारणसे आराके फे मृत्यु होए पुग्ठिस् । टिन दिन पाछ कोर्विन बिहान आहारा लेक आइठ् तर यहर ठाँठम सुन्यता, कारुणिक अवस्थाम लिज्जि ओ बुढनी रठ । लर्कन बचाइ निसेक्लक कारण बुढनीह दोषी करार कैजाइठ् । कोर्विन बुढनीप्रति सहानुभूति डेना ठाउँम गारिभुवा, घृणा, आक्रोस, कुटपिट कर्ना आपन लर्का लिज्जिसँग समेत बैस निदेना कर्लक कारण बुढनीके उपर दमन शोषण डेख्जाइठ् ।
जिन्गीसे हार खाइल बुढनी डुर जाइट् जहाँ मानसिक तनावसे मुक्त हेजाए सोचट । ओह ब्याला कोर्विन संघर्या केयत गोहिसे भेट हुइठिस् । तब जिन्गीसे हारल बुढनीक अवस्था बुझल केयट न्यायके लाग सहयोगी सारथी बन पुगट् । केयट फे नारी पात्र हो । नारी बच्चा जन्माइ पर्ना, हुर्काइ पर्ना, स्याहार सुसार फे डाइ नै करपर्ना ओहम फे पुरुष (थारु) मनैनसे हप्क्वा, डप्क्वा, हिंसा सहे पर्ना ठिक निहो । असिन अन्यायके विरुद्धम न्यायके ड्वार ढकढक्याइ परठ् कैक केयट रज्वक डरबारम उजुरी डेना सल्लाह डिहट् । का जन्नि मनै किल चासो ओ घृणाके पात्र बन्ना हो ? जन्नि मनैन खेलौनाहस प्रयोग किल कर्ना का यह हो नारीन्के जीवन ? का सद्द नारी घृणाके पात्र बन्क बच्ना हो ? केयटमार्फत प्रकट करल नारी चेतना मजा दृष्टान्त हो ।
उपन्यासम उठाइ खोज्लक खास बात :
एकदिन कोर्विन रिसोट्ले गँुजरल । पख्ना फटफटैटि बुढनीक पँज्रे गइल । उही ठाँठेमसे बहार ढकेलल ओ डहियम नै पुगटसम रखेडल । डाइहे असिक कराइ डेख्के लिज्जि चिल्लाइल ‘महि छोरके नाजाउ डाइ’ बुढनी लिज्जिहे छोरे नै सेक्के घुमके ठाँठेम पुग खोजठ । ‘जिउमारि’ बुढनीहे चोरि लगैटि कोर्विन जोरसे डौकल ‘आपन लर्काके मर्ना डाइसे भारि घिनाहुन् बात का हुई ?’ कोर्विन बुढनीहे सराप सराप गरियाइ लागल । जब कोर्विन बुढनीहे पिटे लागल । ओकर कपारिमे खोट्के लागल ओ उहिहे घुच्चेटे लागल । बुढनीहे उहाँसे बल्जबरै जाइ पर्ना हुइलिस् (पृ.३९) ।
असिक हमार समाजम जन्निन् घेरलु हिंसा कर्ना, घृणाके पात्र बनाक आरोपित कर्ना करल डेख्जाइठ । जन्निनके मर्म पिरा, बठ्ठा बुझ्ना कोसिस नै कैजाइठ । वास्तविक पिरा का हो ? जन्ना कोसिस नै कैजाइठ । यकर सिकार बालबच्चन भोग पर्ठिन् कना विषय उपन्यासके पहिल खण्डमे आइल बा ।
समाजम जबसम जन्नि ओ थारु (पुरुष)के समान हक अधिकार नै हुइ तबसम समाजम द्वन्द्वके अवस्था पलि रही यकर लाग थारु (पुरुष) जन्निन बराबर हक अधिकार हुइ परठ कना मूल्य मान्यताके बाधक कुइ फे हुइ निहुइट कना दृष्किोण उपन्यासम उठल बा ।
बुढनीके प्रभावके कारण अधिपति, धर्माधिकारीह फे नारी अस्मिता ओ मर्मके बोध हुइल डेखागिल बा । उपन्यासम निम्न वर्ग, महिला, सिमान्तकृत मनैनके फे जिबन बटिन् । जन्निन घृणा कर्ना ओ लर्का जन्मैना साधन किल मन्ना पितृसत्ता सोचम परिवर्तन आइपर्ना आवाज उठागिल बा । उपन्यासम नारी चेतना आइल पाजाइठ । पशु पन्छिन मानवीकरण कैक ग्रामीण निम्न वर्ग उपर हुइलक अन्याय अत्याचार शोषणके चित्रण करल पाजाइठ । अन्याय सहख निहुइट वाकर लाग अप्नह लरभिर सिक परठ । आपन अधिकार माङ्ख नाहि आछोर लिह परठ कना आवाज उपन्यास उठाइ खोज्ल बा ।
वास्तवम समाजम विद्यमान लैङ्गिक विभेद, जन्निन कठपुतलीके रुपम प्रयोग कर्ना सामाजिक तथा धार्मिक अन्धविश्वास ओ पितृसत्ताके आडम थारु (पुरुष) जन्निनके उपर कैजिना ज्याजटि ओ दुव्र्यवहारके यर्थाथ चित्रण कैक असिन प्रवृत्तिप्रति विद्रोह कर्ना सशक्त माध्यमके रुपम आजके नारी स्रष्टाहुक्र उपन्यास विधाह रोजल डेख्जाइठ । यि बातह इन्दु थारुके बुढनी उपन्यासम सशक्त रुपम उठाइल बा । समाजम जर गार्ख बैसल पितृसत्ताके विरुद्धम नारीवादी चेतना फे उपन्यासम लेखकिय दृष्टिकोणको रुपम केयट बुढनीसे कहट ः
‘टुँ काहे रज्वा रज्वक मनै ओ कोर्विनके सुरटा करटो ? टुँ काहे ओइनहे जिटे डेहटो ? जबकि टुँ बहुट डुख खाँडसेक्ल बटो । टुँ आप आपन लाग सोचो, नै टे टोहारठे आब का बँचल बा ? यिहे रिस ? यि मनके टिट बा ओ अक्केलि मन बा (पृ.४५) ?’
असिक महिलाके पिरा, अन्याय परलम आपन ठ¥वाके कुकृत्यके भण्डाफोर कर्ना आपन न्यायके लाग आघ बह्र पर्ना विषयह लेखकीय दृष्टिकोण आइल पाजाइठ । भोज विहाके माध्यमसे जन्निन शोषण कर्ना, हिंसा कर्ना, बिचम बिचल्ली पर्ना परम्पराह भत्काइक लाग नारी जाग परठ । उठ परठ । पिराम रिस पाल्ख न्याय मिल नैस्याकट कना नारी हक ओ स्वतन्त्रताके वकालत कैगिल डेख्जाइठ । बुढनी उपर हुइलक अन्यायके विरोधम ढेर सङ्घर्ष हुइल बा । समतामूलक समाजके स्थापना, पितृसत्तात्मक एकाधिकारके अन्त्य, नारी अस्तित्वके खोजी, सहअस्तित्वके कामना ओ पुरुषवादी हैकमके विरोध उपन्यासके केन्द्रीय कथ्य हो ।
वर्गीय, लिङ्गीयके खस्मोराइ
बुढनी उपन्यासम वर्गीय समस्याह फे प्रस्तुत कैगिल बा । वर्गयुक्त समाज टिहुपर थारु समुदाय फे वर्गीय दृष्टिकोणले निम्न वर्गउपर कठोर जिबन, हुकनक उपर हुइना शोषण, निम्न वर्ग ओ उच्च वर्गबिचके सङ्घर्ष यि उपन्यासके मूल पक्ष हो । ओसहख लिङ्गीय समस्या, भेदभाव, शोषण दमनसे मुक्तिके खोजि फे कैगिल बा । उपन्यासम उच्च वर्ग ओ निम्न वर्गबिच वर्गीय द्वन्द्व सिर्जना हुइल बा । उपन्यासम उच्च वर्गके प्रतिनिधि पात्र अधिपति, धर्माधिकारी, कमाण्डर बट कलसे निम्न वर्गके पात्र सूर्या, बरघर, बुह्र्वा, पिरा परल जन्नि मनैया, बुढनी बाट ।
उच्च वर्गक मनै जैह्या फे निम्न वर्ग मनै डर ओ ढम्कि फैल्वाख पुस्तौसम शोषण दमन कैना मनसाय रठिन् कना बात अधिपति, धर्माधिकारी कानुनके किताबह हठियार बनैना, उज्जर मुँस्वाह बलि चह्राइक लाग पक्रना, गाउँ मनै आपन मिहिनेतले अनाज उत्पादन करल ब्यालाम सिपाही लगाख लुट्ना, गरिब जन्निह न्याय नाडेक मालिक पक्षम फैसला कर्ना, फुटाऊ ओ शासन करो कना हिसाबले गरिब किसानके विरुद्धम गरिब लौव बस्टिक मनैन प्रयोग कर्ना, न्युनत्तम आपन हक अधिकारसे बन्चिट हुइ पर्ना यर्थाथ उपन्यासम पाजाइठ । यिहीले हमार समाजम निम्न वर्गक मनै न्यायके महसुस कर निसेक्ठ कना वास्तविकताके पिराके पर्दाफास बुढनी उपन्यास कर्ल बा ।
‘समाजम अवस्थित वर्गीय एवम् लैङ्गिक विभेदह पुँजीवादसे गठबन्धनम रहल पितृसत्तासे लग्घ मानठ ओ साहित्यमफे पुँजीवाद गठबन्धनके अन्त्य करपर्ना आकांक्षा ओ प्रयत्नम रह पर्ना ठानट (त्रिपाठी,२०६९,पृ.९४) ।’ बुढनी उपन्यासम पितृसत्तात्मक मानसिकताह मातृपक्षीय कोणसे ह्यार पर्ना उठान कर्ल बा । समाजम लैङ्गिक विभेदके सँगसँग वर्गीय विभेद फे बा । यकर अन्त्य हुइलाक निम्न वर्ग ओ जन्नि मनै एक ठाउँम ठ्रिहाक पुँजीवादी प्रवृत्तिह अन्त्य कर पर्ना आवाज बुलन्द हुइल पाजाइठ ।
निष्कर्ष
नारी चेतना, चिन्तन, शिक्षा ओ सञ्चारके विकाससँगसँगे विश्वव्यापी रुपम फैलटि गइल नारीवाद थारु भाषा साहित्यम भर्खर पौली सर्टि बा । बुढनी उपन्यास नारीवादी सिद्धान्तम आधारित स्वैरकल्पनात्मक मौलिक उपन्यास हो । यकर कथावस्तु मानवेतर एवम् मानवीय पात्रसे प्रस्तुत कैगिल बा । पितृसत्तात्मक सामाजिक परिवेशम जन्नि मनै भ्वाग पर्ना पिरा, दुःख, वेदना ओ जटिल परिस्थितिके चित्रण एवम् असिन प्रवृत्तिप्रति आपन तिब्र विरोध प्रकट कर्ना क्रमम नारीवादी चिन्तन आघ आइल डेख्जाइठ ।
‘बुढनी’ उपन्यासम समाजम शिक्षित वर्ग ओ ठूलावडा शासक वर्ग नै थिचोमिचो, अन्याय, अत्याचार दुव्र्यवहार कर्ठ कना बात डेखागैल बा । वर्तमान समाजम अहमिन् फे पितृसत्तात्मक सोचके कारण बुढनी असक कैयो नारी पिरा, बठ्ठाम बात । न्याय डेना ठाउँम कानुन एकठो डेखावा किल हो, शासक वर्ग कानुनके किताब डेखाक सर्वहारा वर्ग ओ जन्नि मनै न्याय पाइ नैसेक्ल हुइट कना बात फरछ्वारसे आइल बा । कानुनके दुरुपयोग कर्टि झुठके हठियारके रुपम प्रयोग कर्ठ कना सामन्त वर्गके अवशेस हमार समाजम जर गार्ख रलक बातके पर्दाफास कैगिल बा ।
प्रकृति, जिव जिनवार, मनैनके सम्बन्ध सदियौसे जोरल बा । हम्र एकदोसरमे निर्भर बाटि लेकिन यकर संरक्षण कर्ना काम फे मनैनके हो कना सङ्केत उपन्यासम आइल बा । तर शासक वर्ग प्रकृति वन जङ्गलसे आपन स्वार्थ पूर्ति कर्ना कामम केल प्रवृत्त रलक डेखाइट । समाजम महिला उपर दमन, शोषण कर्ना सामाजिक विकृति र विसङ्गतिह चिरफार कैगिल बा ।
उपन्यासम आइल पुरुष पात्र कोर्विन, अधिपति, धर्माधिकारी, कमाण्डर, सिपाही आदि पात्रहुक्र जन्नि ओ निम्न वर्गप्रति डेखाइल दुव्र्यवहारले खल पात्रके रुपम चित्रित बाट । शासक वर्ग कमजोर ओ गरिबीके फाइदा उठाइक लाग विभिन्न प्रपञ्च रच्ना कर्ठ । बुढनी, बरघर, बुह्र्वा मनैया, केयत, सूर्या डाइ आदि पात्र गरिब गुरुवन ओ जन्निनके सहयोग करपरठ कना असल पात्रके रुपम लिह सेक्जाइठ । बाबा बघवा यि उपन्यासके अन्याय कर्ना चाहे जे हुइलसे फे र्इँटके जवाफ पठ्ठरसे डिह परठ कना क्रान्तिकारी जुझारु पात्र ओ अन्यायके विरुद्धम लर्ना जोढा पात्र हो ।
बुढनी पात्रके माध्यमसे आपन हक अधिकार ओ न्यायके लाग जन्निन् स्वयम अप्नेहे जाग परठ, सचेत हुइ परठ ओ पितृसत्ताके विरुद्धम ठ्रिहाइ परठ कना वकालत कर्ल बा । सामाजिक सांस्कृतिक रुपान्तरणके लाग विद्रोह फे जरुरी बा यकर लाग निडर ओ सङ्घर्ष जरुरी रलक बोध करैल बा । स्वयम् जन्नि मनै अप्नेहे जाग परठ, सचेत हुइ परठ ओ आपन हक अधिकारके लाग, स्वतन्त्रताके लाग पितृसत्ताके अन्त्य कर्टि समतामूलक समाजके निर्माण जरुरी रलक डेखागिल बा ।
उपसंहार :
“बुढनी” उपन्यास नारी जीवनके आधारभूत समस्या, प्रेमिका, पत्नी र डाइके अस्तित्वमूलक समाधान खोजल बा । जन्निन ढरटि असक चुपचाप अन्याय सहना सहनसिल, अप्न पिरा भोग्ख, जोबन लुटाख फे विद्रोह निकर्ना निबोल्ना त्यागी र संयमी, क्रुर ठ¥वाके हप्कि डप्कि सह पर्ना समाजम पुरुषप्रधान सत्ताके विसंगति तथा नारिनके उपर कैजिना अत्याचारके विरोधम बुढनी ठ्रिहाइल बटि । यि उपन्यासम पुरुषप्रधान समाजम नारिनके अस्तित्व बुढनी खोज्ल बाटि । पुरुष (थारु) के अत्याचारके विरोध एवम् न्याय डेना ठाउँम जुन पुरुष न्यायके खोस्टा डेखाक झुठके हठियार बनैल बाट ऊ निम्न वर्ग ओ दुखी जन्नि मनै कबु न्याय पाइ निसेक्ना जिवनके बोध हो कना बात स्पष्ट कैगिल बा ।
भासा, शैलीगत, परिवेशगत ओ अवश्यकताअनुरुपके भासा, शैलीके सही तरिकाले बेल्सल पाजाइठ । मानवेतर पात्रके मानवीकरण कैक परिवेश फे स्वैरकल्पनात्मक बन पुगल बा । विषयवस्तु ओ पात्रअनुसार सुहैना मेरिक भाषा प्रयोग कैल डेख्जाइठ । दर्शनम आधारित हुइलक ओहर्से भाषिक क्लिष्टता ओ कथ्य भाषाके प्रयोग हुइल बा । सरल, मिश्र ओ संयुक्त वाक्यके प्रयोग, छोट–छोट मिठ, आलङ्कारिक, पदविचलन ओ अनुकरणात्मक शब्दके प्रयोगले थप सुन्दर बन पुगल बा । प्रथम एवम् तृतीयपुरुष दृष्टिविन्दुम लेख्गिल यि उपन्यासम संवाद योजनाक आँखिले हेरबेर सुन्दर देख्जाइठ । ‘बुढनी’ उपन्यासके कथानक विन्यास पहिल ओ दुसर खण्ड कैख क्रमशः आदि, मध्य ओ अन्तिमके शृङ्खलाम बाहान्गिल बा । यि उपन्यासके केन्द्रीय पात्र बुढनीके कार्यव्यापारके आधारम कथानकके निर्माण कैगिल यि उपन्यास चरित्रप्रधान उपन्यास कह सेक्जाइ । यकर कथानकले जन्निनके अस्तित्वह पुरुषप्रधान सामाजिक मानसिकताले स्वीकार नैकर्ना प्रेम ओ कर्तव्यक मूल्यस्खलन हुइल पाजाइठ कना मूलभूत पक्षह डेखागिल बा ।
बुढनी उपन्यासम तराई परिवेशके बन्वा, गाउँ सहरके परिकल्पनाम स्वैरकल्पनात्मक परिवेश बनाइल पाजइठ । बन्वा, गाउँ ओ सहरके परिवेशम पात्रके सम्पर्क र सङ्घर्षके कार्यव्यापारह प्रभावकारी रुपम उद्घाटन कैगिल बा । यि उपन्यासके कालिक परिवेश माओवादी द्वन्द्व कालके हो कना अनुमान करे सेक्जाइठ । मानवीय पात्र ओ मानवेतर पात्रके समिश्रणम लिखल बुढनी उपन्यासके स्थान परिवेश फे काल्पनिक बा । लेकिन थारु समुदायके रिटभाँट, चालचलन आदि सांस्कृतिक परिवेशले तराईके गाउँ बस्टिक झल्को डेहट कलसे सहरके रुपम सदरमुकाम ओ काठमन्डु राजधानीहे अनुमान कर सेक्जाइट ।
बुढनी उपन्यासके भासा अत्यन्त थारु कथ्य भाषाके प्रयोग ओ पुरान मौलिक रलसे फे क्लिष्ट ओ परिष्कृत बनल बा ।
ओस्टक मानवेतर पात्रके मानवीकरण कैलक ओहर्से भासा,शैली ठनिक अन्ख्वाहर लागठ । पात्रअनुसार ठेट अर्गानिक थारु भाषाके प्रयोग कैगिल उपन्यास विशिष्ट बनल बा । ठाउँ–ठाउँम कवितात्मक गिडके स्वाद पाजाइठ । कौनो कौनो ठाउँम थारु मौलिक शब्द पठ्राह ढुंगा, फोक्साह फोक्सा कैगिल बा, कहु कहु भासिक बिचलन फे डेख्जाइठ । द्वन्द्वको सशक्त चित्रण, आलङ्कारिक तथा तार्किक अभिव्यक्तिके चित्रणम इन्दुके विशिष्टता पाजाइठ । विशेषतः बुढनीक बोलल वाक्यम न्यायिक अगुवाप्रति गहिर व्यङ्ग्य पा जाइठ ।
बुढनी उपन्यास आयामके आधारम मध्यम आकारके बा । उपन्यास दुई खण्डम बाट्गिल बा । एक सय त्रिचालिस पेजम रहल यि उपन्यासम दश पेज आघ ओ पाँच पेज पाछ पृष्ठ सङ्ख्या नैखुलाइल हो । उपन्यासके कभर मध्यम खालक बा, कभरके डिउ डिउम बनागिल चित्र थारुपन झल्कना परम्परागत भित्ताचित्र ओ अष्टिम्की चित्रके झल्को डिहट । यिहीले थारु संस्कृतिके बोध कराइठ । उपन्यासके मूल पात्र बुढनी जो मानवेतर पात्र कौवा ओकर चित्र ओ एकठो लाल डाना आहाराके सङ्केत कैल चित्र डेख्जाइठ ।
इन्दु थारु नारीवादी जीवनदृष्टिह अवलम्बन कैख बुढनी उपन्यासके रचना कैगिल पा जाइठ । विभिन्न पात्रके तर्क वितर्कले आकर्षक बनागिल बुढनी उपन्यासह भाषाशैलीके रोचक प्रयोगशैलीले उत्कृष्ट बनैल बा । आधुनिक थारु औपन्यासिक क्षेत्रम पितृसतात्मकवादी परम्पराह चुनौत डेटि नारी वर्गके समतामूलक उपस्थितिके वकालत करल पा जाइठ ।
सन्दर्भ सूची :
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