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[ वि.सं १४ आश्विन २०८३, बुधबार ]
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गिद्धके प्राकृतिक बासस्थान संरक्षण हुइक पर्ना

पहुरा | १४ आश्विन २०८३, बुधबार
गिद्धके प्राकृतिक बासस्थान संरक्षण हुइक पर्ना

पहुरा समाचारदाता
धनगढी, १४ कुवाँर । प्रकृतिके कूचिकार गिद्धके प्राकृतिक बासस्थान संरक्षण हुइक पर्ना एक कार्यक्रमके सहभागीसे जोड डेहल बटै ।

नेपाल पन्छी संरक्षण संघसे बुधके धनगढीमे आयोजना करल प्रदेशस्तरीय कार्यशाला गोष्ठीके सहभागीसे गिद्धके प्राकृतिक बासस्थान जोगैना जरुरी रहल बटलै । गिद्धसे सिमल, हर्रो, बर्रो, हल्दु, साल लगायतके अग्ला रुख्वामे कोटका लगैनाके साथे असिन रुख्वामे बैठना करल जनैले बा । गिद्धके बासस्थानके रुपमे रहल असिन रुख्वाहे जोगैना जरुरी रहल उद्योग, पर्यटन, वन ओ वातावरण मन्त्रालयके सचिव दीर्घनारायण कोइराला बटलै ।

गिद्धके बासस्थान सुरक्षित बा कि नाइ कना ओकर अनुगमन हुइना आवश्यक रहल बटैटी उहाँसे एकर लग सरकारी ओ गैरसरकारी दुनु पक्षसे मिलके काम करना जरुरी रहल बटलै । कोइराला कहलै,“मृत जीवकिल खाइना कार्नीभोरस जटायु लोप हुइटी रहल बटै ।

इहे कारण प्राकृतिक बासस्थान जोगैना परठ । प्रतिबन्धित विषादीके नियन्त्रण हुइक परठ । गौशालामे विषादी प्रयोग नैहुइल गाई ढारेक परठ ।” निकुञ्ज ओ आरक्ष लगायत संरक्षित क्षेत्रमे मरजिना गैँडा, हात्ती जस्ते बरवर जनावरहे गिद्ध खाइ पाइना वातावरण बनैना आवश्यक रहल उहाँके कहाइ बा । नेपालमे टमान नौ प्रजातिके गिद्ध पाइना करल बटै । उ मध्ये सुन गिद्ध, सानो खैरो, डङ्गर, सेतो, हाडफोर ओ हिमाली गिद्ध रैथा प्रजाति होइ ।

राज गिद्ध, खैरो ओ लामोथुँडे गिद्ध भर बसाइँ सरके आइना गिद्ध रहल जनैले बा । मरल जनावरके सिनो खाइना मने अपन सिकार नैखाइना इ प्रजातिके धार्मिक ओ वातावरणीय हिसाबसे बरवर महत्व बा । एकठो गिद्धसे अपन जीवनकालमे एघार हजार अमेरिकी डलर बराबरके फोहोर सफा करके वातावरणहे प्रदूषित हुइनासे जोगैना करल बिसिएनके परियोजना फिल्ड अधिकृत एवम् चराविद हिरुलाल डङ्गौरा बटलै । उहाँके अनुसार आहाराके खोजीमे गिद्ध एक दिनमे एक सय किलोमिटरसम उडे सेक्ठै ।

गिद्ध बैठना असिन कोर क्षेत्रमे विषादीके प्रयोग शून्य हुइना आवश्यक बा । विषादीके कारण गिद्धके मृत्यु नै हुइ कना नेपालमे डाक्लोफेनेकके विकल्पमे अन्य औषधि प्रयोग करना सुरु हुइलागल डङ्गौराके कहाइ बा । नेपालमे २०४७ सालओर पाँचसे १० लाखसम गिद्ध रहल बटलै ।

ओस्टेक, गाईभैंसीमे पेनकिलरके रुपमे प्रयोग करल डाइक्लोफेनेक विषादीके कारण गिद्धके अस्तित्व खतरामे परल रहे । डाक्लोफेनेक विषादी मरल जनावरके सिनो खाइटी तीव्र गतिमे गिद्ध मरल बटलै । गिद्ध मृत्युके प्रमुख कारक डाइक्लोफेनेक बनलपाछे औषधि व्यवस्था विभागसे २०६३ जेठ २३ गतेसे नेपालमे इ विषादीमे प्रतिबन्ध लगाके बिसिएनके भेटेरेनरी चिकित्सक डा. विकल्प पाण्डेय बटलै ।

उहाँसे डाइक्लोफेनेक बिक्री, वितरण ओ प्रयोग करल पाइलमे तीन वर्ष कैद ओ २५ हजार जरिवाना ओ दुनु सजाय हुइना व्यवस्था रहल उल्लेख करल बटै । गिद्धसे सिनो खाके पारिस्थितिक प्रणालीमे सन्तुलन कायम करना साथे मनै जुनोटिक रोगसे जोगैना करल जनैले बा ।

प्रकृतिके लग महत्वपूर्ण इ प्रजातिके लग सुरक्षित आहारा व्यवस्थापन करल जरुरी रहल चराविद डङ्गौरा बटलै । उहाँ कहलै,“पछिल्का समय गौशालासे गिद्ध प्रत्यक्ष रुपमे आहारा पाइटी रहल बटै ।” सुदूरपश्चिम प्रदेश प्रादेशिक वन निर्देशनालयके निर्देशक हेमराज विष्टसे डिभिजन वन कार्यालयहे सुरक्षित आहारा व्यवस्थापनमे सहयोग, गिद्धके बासस्थान संरक्षण ओ अनुगमन करना आवश्यक रहल बटलै ।

इहे प्रदेशमे गिद्धके अवस्था सुधारोन्मुख हुइलके साथे कोटकाके संख्यामेफे बह्रटी आइल जनैले बा । डार्बिन इनिसिएटिभके आर्थिक ओ रोयल सोसाइटी फर प्रोटेक्सन बर्डके अगुवाइ ओ नेपाल पन्छी संरक्षण संघके कार्यान्वयनमे गिद्ध, गाई ओ मनै एक प्राचीन सम्बन्द्ध सुदृढ करना सञ्चालित परियोजना अन्तर्गत कार्यक्रम आयोजना करल रहे । कार्यक्रममे गिद्धके महत्वबारे जानकारी करटी चराविद हिरुलाल डङ्गौरा ।

 

 

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