थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत १८ अगहन २६४३, बिफे ]
[ वि.सं १८ मंसिर २०७७, बिहीबार ]
[ 03 Dec 2020, Thursday ]
‘ बटकुहि ’

डाग लागल टन्ना

पहुरा | ८ कार्तिक २०७७, शनिबार
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डाग लागल टन्ना

महिंहे हरडम मैंया कर्ना मोर जन्नि तिलरानी । ओकर उप्पर कौनो किसिमके संका टिल बराबर कैलेसे फेन पाप लग्ना अस । महा सुखि घरबार रहे हमार । जन्निसे सरसल्लाह कैके टब बल्ले कौनो काम सुरु कैना मोर बानि डेख्के मनैं महि जन्निसे हटल मनैंया कहिँट । लकिन महि यि बाटेम कौनो पर्वाह नै रहे ।

ठरुवा मेहरुवा टे एक लह्रियक डुइ पहिया हुइट, अक्के चक्का पन्चर हुइलेसे लह्रिया कैसिक नेंगे सेकि ? उहे ओर्से आनेक घर छोर्के आइल छाइ मनैन् हम्रे पुरुसवर्ग सम्मान कर्ना चाहि इहे मोर सोंचाइ रहे ।

तिलरानीसे भोज हुइलक समय महिं आझ फेन रोमान्चक लागठ । जानो सोंघ कारे अस । उ ओ मै अक्के स्कुल पह्रि । मैं तिलरानीहे हृडयसे चाहुँ, सायड उ फेन । हमार डुन्हुनके गाउँक डुरि खास नै रहे । मने छुट्कि राप्ती लडिया बिच्चेमे बहल रहे । सायड लडियक डुनु किनारा मिल्ना कोसिस कर्टि रहे ।

उ अठ्वामें पह्रि, मैं डस्वामें । जिल्लाव्यापी माविस्टरिय हाजिरिजवाफ परटियोगिटमं हमार स्कुल भाग लेहल टब्बे । परटियोगिटामे भाग लेहे औरे स्कुलमें जाइ परल । मैं टोलि नेटा रहुँ, उ फेन छान गैलि टोलिमें । टब्बेसे हुँखिनसे लग्गे हुइना मौका मिलल् । कुछ प्रस्नके उट्टरमे उ फेन सहयोग कर्लि । उहे परटियोगिटा हमरिहिन बहुट लग्गे कराइल । सिनियर हुइलक नाँटे मैं हँुखिन पढाइमें फेन मडट करुँ ।

समयके चक्र, मै डस्वा पास कैके सडरमुकाममें डेरा कैके पहे्र लग्लुँ । तिलरानीसे भेटघाट कम हुइ लागल । मैं जब छुट्टिमे आँउ तिलरानीसे भेट कर्ना जरुर कोसिस करुँ । लावा बर्स, माघ अस्टे टरटिउहारमे सामान्य सुभकामना लेना डेना बाहेक हमार डुन्हुनके बिच कौनो गहिँर चिठि–चपाटिके क्रम नै रहे ।

छुट्कि राप्ती लडियक पानि नाँघेबेर बरे जुर लागल । उहिसे बह्रटा जुर मोर मनेम पैंठल, अगर तिलरानी “ना” कैह डि टे ? एकफेरा उहि अन्डेसा फेन नै पठा गैल हो । उ महिं जिन्गि भर नै मजा डृस्टिसे टै नै हेरि ?

आइएके जाँच डेके कुछ डिन खालि रहुँ । डस्यक समय रहे । गाउँक संघरियन मोर घर गल्गला–गल्गला डस्या मन्टि रहि । अस्टे डुलहा–डुलहिक बाट उठल । संघरियन मोर भोजक बाट उठैलाँ ।

– जाइ यार, आझु तिलरानीसे टोरिक ठोकठाक खा आइ ।

– हाँ यार, उहे टो असौँ डस्वा पास कैके प्लस टु ज्वाइन कै ढारल । कहुँ औरे गोचा टेक्लि बस हेर्टि रैह जैबे ।

– बह्रटा ना सोंच, भोज कर्ना उमेर इहे टे हो । लवन्डिन टे आउर बह्रठाँ टे अक्को नै सोहैठाँ । कि जनो तिलरानीक घरक मनैं डुलहा खोज्टि बटिस ।

संघरियन अस्टे गनठन–मनठन करे लग्लाँ । खाइट–पियट झोलपट अन्ढार हो गैल रहे । मोर नाँइ नास्टिके बाबजुड संघरियन जबर्जस्टि तिलरानीक गाउँ ओर लैगैलाँ । छुट्कि राप्ती लडियक पानि नाँघेबेर बरे जुर लागल । उहिसे बह्रटा जुर मोर मनेम पैंठल, अगर तिलरानी “ना” कैह डि टे ? एकफेरा उहि अन्डेसा फेन नै पठा गैल हो । उ महिं जिन्गि भर नै मजा डृस्टिसे टै नै हेरि ?

मन टे लागल बिच डगरेम हेगासलके बहाना लगाके भाग जाउँ । संघरियन जुन आढा जाने आघे आढा जाने पाछे लागल रहिंट । महिं बिच्चे–बिच कैले रहिंट । जानो पुलिस चोरवाहे पकरके लैजइटि बटाँ । “आब, आ टे गैलुँ जा टे परि–परि तिलरानी रिसाइ टे का, मोर लग का यि सारा डुन्याँ खालि बा । एकसे एक मिल्हिं । एकठो बठिन्या रिसाके का हुई ।” एक मन अस्टे कहल, टब बल्ले नोंडर पौलि कुछ हलुक हुइल ।

चिन्हल घर पैंठलि । खबर पठा गैल कि, फलाने फलानिहे हेरे अइटि बटाँ । मन्जुर हुइहिन कलेसे आझ टिका–टाला लगाके जैहिं । आखिर जौन डर रहे, उहे हो गैल । टब्बे तिलरानीक घरक मनैं बेरि ओरि खाके सुट्ना टरखरमे रहिंट । खबर पैटि साइट तिलरानीक बाबा आगि हो गैलिस ।

–इहे लन्डि बलैले रहल हुइ अपन मनरख्नाहे । टब्बे टे राटिबिखे आइल बटिस टिका लगाइ ।

– जा, अब्बेहें चला जा । का टिका टाला लगाइ परल । उह्ररके चल जैना हो बाटे खटम हो जाइट । का यहाँ नेंउटा डे–डे बलाइ परटा ।

सन्डेसबाहक अस्टे खबर नानल । ‘अरे आउर फुहर–फुहर का–का कहटिहिस । मैं बिना ओनाइल चल अइलुँ । बेक्कारमें खबर जनाइ गैल हस लागल ।’ सन्देसबाहक संघरिया डुःख मनौटा करल ।

टब्बे मोर उप्पर का बिटल हुइ । अपनेन्के अनुमान लगाइ सेक्ठि ? सन्डेसबाहक संघरियक घर जाँर छाबल रहे । अन्डिक जाँर महा गुरि रहे । भर्खर अक्के–अक्के गिलास पिले रहि टे ओइसिन खबर आ गैल । सारा जाँर फिक्कल हो गैल । झटरपटर उठ्के सन्ढे अपन गाउँक डगरा लग्लि ।

बाफ रे चिठ्ठि अटरा आँखर सब्डमे लिखल रहे कि मोर मुँरि जुरटे घुमे लागल । अबरक रुख्वमसे उटर्लु ओ मचियम बैठके ‘गालि पुरान’ पह्रटि गैलुँ । जेउँ जेउँ चिठि ओरैटि गैल, मोर मुँरि हलुक हुइटि गैल ।

अइनासे पहिले डगरेम बरवार सुरा मारल भेटैले रहि । सायड “है” खाइ गैल रहल हुइ । नोक्सान बेहोरल किसन्वा भठ्ठा लगा डेहल हुइ । महिं लागल– महिं फेन उहे सुरक नन्हे कोइ चार–छ भठ्ठा लगाके जिट्टिए म्वाँ डेहल । मोर बोलि ओलि बन्ड हो गैल । साँस कैसिक लेहटुँ पट्टा नै । जानो डेंहमे एक बुँडा रकट नै हो ।

सुइ गिर्लेसे फेन पट्टा पैना लम्मा चुप्पिक बाड सबजे संघरियन घरे–घरे लग्लि । सारा डस्या फिक्कल हो गैल रहे । राटभर निंड नै परल । टोरैँया गनके सुट्लुँ । रैह–रैह सम्झु, बिचारि तिलरानीक का हुइल हुइहिस् ? उ बिचारिसे आब फुरहन्ने बलटल गहिँर मैया लागल ।

डोसर बिहान गाउँभर हल्ला चलल् । फलाने राटके डुल्हनिया हेरे गैल रहे । मोर बाबा यि बाट एक कानले सुनके डोसर कानले उरा डेलाँ–‘अरे लर्कन राट कुछ ज्याडा जाँर लाग गैल रहिन् काहुन् ।’ असिक पारिवारिक अडालटसे टे मैं छुट्कारा पा गइल रहुँ मने तिलरानीक अडालटमें अपराढि बनके कठघरामें ठह्रियाइल रहुँ । जा टे सजाय डिँट, स्विकारे पर्ना रहे । मोर डिमाक काम नै करटेहे, चिठ्ठि लिखक कहाँसे सुरु करुँ ओ तिलरानीसे अपन बचपना हरकतके लग कैसिक माफि माँगु ?

राटके बिना बेरि खाइल सुट जा गैल रहे टौन कलवा जुन फेन भुँख चिरोरि नै करटेहे । टब्बे अङनम् तिलरानीक गाउँक लौंरा बिल्गल । गोझुमसे चिठ्ठि निकारके डेहल । मैं पानि–ओनि डेहक ख्याल नै कर्लुं । चुप्पे चिठ्ठि लेले अबरक रुखवम चौंढ्लु । चिठ्ठि पहे्र लग्लुँ ।

प्यारा कान्हा

राम–राम

टुँ टे गज्जब कै डेलो । मैं सपनम् फेन नै सोच्ले रहुँ कि टुँ ऐसिन घटिया व्यवहार कर्बो ? का क्याम्पस पह्रना मनैन्के अक्किल अस्टे रहठ ? ठुइक्क टोहार बुड्ढिम बुजकुन लग्लक ।

मन टे लागटा, टोहार घरबैठे जाके झगडा करुँ ? मने का करुँ, एकठो कँवारा लर्कि हुँ ना । टुँ टे जा करो, टोहार इज्जटमे कब डाग लागि । डाग लागठ टे लर्किन उपर । मोर गाउँभर हल्ला हो गैल बा, टोहार बहाडुरि कामके । एकचो मोर हाँठ मंग्नासे पहिले डरुवामें पानि ढिकाके का करे नै मुलो टुँ ? बटाउ, महिं जवाफ डेउ ।

बाफ रे चिठ्ठि अटरा आँखर सब्डमे लिखल रहे कि मोर मुँरि जुरटे घुमे लागल । अबरक रुख्वमसे उटर्लु ओ मचियम बैठके ‘गालि पुरान’ पह्रटि गैलुँ । जेउँ जेउँ चिठि ओरैटि गैल, मोर मुँरि हलुक हुइटि गैल ।

टुँ कहठुइबो, एक घरि सोङघ काह्रे तिलरानीक घर गैल रहि । मैं का सोङघके पात्र हुँ । टुँ आब अपन कर्मना पर पस्टाके का कर्बो । टिर कमानसे निकर सेकल, बाट जमानसे निकर सेकल । अब का फिर्टा लेहे बनि ?

जौन हुइना हो गैल कान्हा, सायड टोहार गाउँओर फेन राटिक क्रियाकलापके सचित्र वर्नन् हुइ । एक बगाल भुल्ठहवन् लेके आइल रहो जे । ओइनेहे टे हल्ला मचाइ ठुइहिं ।

कहठाँ नारिन्के उप्पर एकचो डाग लागठ टे कबो नै मेटठ् । डोसर लौंरा फेन महिं हेरे आइ टे टोहार कारनामा जरुर पट्टा पाइ । ओहे ओर्से टुँ डिलसे चहठो कलेसे का करे राटके चोरहस अइठो । हिम्मत करो डिनके आउ । मोर बाबासे हाँठ माँगो । बाबक् डिल जिटो, महिं डुल्हनिया बनाके लैजाउ ।

टोहार डिलके रानि
उहे तिलरानी

चिठ्ठि पह्रके अट्रा हलुक लागल कि मानों मैं रुवा हुँ । मुँहेमसे आपसे आप गाना छुटे लागल । मैं बड्रिमे उरल हस महसुस कर्लुँ । फुरहन्ने कहठाँ, ‘मर्दले आँटे वर्ष दिन, आइमाइले आँटे एक्कै छिन ।’ महिं निर्नय लेना कट्रा सहजिल हो गैल रहे । बिगार काम कैके टौन अपराढि जेलसे छुटल अस लागल । टुरुन्टे चिठ्ठिक जवाफ लिखके पठैलुँ । टबसे सिलसिला जारि रहल चिठि चपाटिके । हमार नुकिक् साँढाले बाबा छाइ डेना राजि हो गैल रहिन् ।

कहठाँ बरेरुवा ढेउर डिन नै टेक्ना चाहि । झुक्का किल गारके का काम । केउ मच्छि मारके झुक्का फेन जस के टस गार डि टब ? ओहे ओर्से तिलरानीसे हालि भोज कर्ना ठरठेकान हुइल ।

***

मोर जिन्गिक सुखि गाडि डौरे लागल । भोजक वाड व्यावहार पकर लेहल । तिलरानी गँउहिक स्कुलिम मस्टन्या बन गैलि । मैं छोटमोट हुइलेसे फेन सरकारि नोकरि पकर लेलुँ । सडरमुकामसे यल डुर गाउँ नै रहे । बसेम अस्टे डुइ घन्टा जटि । उहे ओर्से सुख÷सनिच्चर मिलाके गाउँ आइल करुँ । भोज हुइलक टिन बर्सक बाड हमार पैल्हा सन्टान छाइ हुइल । खुसिक सिमा नै रहल ।

लर्कापर्का हुइठाँ टे बुह्रिया–बुह्रवनके मैंया लर्कनमें सर जाइठ । तिलरानी छाइक स्याहार– सुसारमें व्यस्ट हो गैलि । थारुनके पापि मन । जनेवा हेल्हा करे अस लागे । पैल्हक हस मैंया तिलरानी नै कर्ठि कि कना मनेम लागे ।

एकडिनके घटना, मोर जिन्गि हिलाके ढै डेहल । उहे ‘डाग लागल टन्ना’ डिमाग खराब कै डेहल । सडरमुकामसे आइबेर बिच डगरेम् बस बिगरलक कारन यहोंर संघरियक घर रहे परल । बिहानके अनगुट्टि ढुसमुस्हे उठ्लुँ । मोर झोलम छाइक लग खेलौना रहे । छाइ बरस डिन नाँघ सेक्ले रहे । कब घरे पुगम, जन्नि–छाइसे भेट हुइ, अस्टे कल्पनामें मैँ करिब छौ बजे बिहानके घरे पुग्लुँ ।

छुटियाहा हुइल पैन्ट टंगा डेलुँ । आउर लुग्रा फेन । लुंगि पहिरलुँ । जगेरा झुलवा घालके खेटवा ओर डगर नमैलुँ । बुह्रिया घारिम गोबर काह्रटेहे, गझिन्के आँख मिस–मिस ओकर ढोटि हेर्लुँ । लेउ कहुँ कहुँ उहे लस्गरवा डाग अस, लंहगम फेन । संका नै रैह गैल, जरुर मोर डिलके रानि तिलरानी डोसर रज्वा खोज राखल ।

डवार ढक्ढक्ओइलुँ । कुछ बेर रैहके डवार खुलल् । ‘ले, मैं टे के हो कहटहुँ । कबक बसेम अइलो यहजुने ?’ बुह्रिया पुछल । मैं जवाफ डेनासे फेन बुह्रियक गालेम अपन डुनु हाँठ घुमैलुँ,‘छि ! यि टे अइसिन जुर हाँठ । बुहै्रले पर चलक मन लग्ना । ओंहोर जाउ । मैं चाय बनाके नानटुँ । छाइहे जिन चलैहो । बिचारि बलटल सुटल बा । जागि टे रोइ ।’ बुह्रिया महि फट्कारके भन्सम चलगैल ।

खटियम बैठ्लुँ, हेर्लुँ छाइक निर्डोस अनुहार । कट्रा बह्रियासे सुटल बा । साइड कुछ सपना डेखठुइ । छाइकमेसे अनुहार हटैलुँ । एकफाले चुटरेम जुर अस लागल । हेर्लु, संसार हिले अस लागल । मोर मन सटप्रटिसट ठहर करल । यि टे थारु मनैन्के मुट््नरियामेसे निकरना चिज हो । मोर बुह्रियक पठरिम कैसिक ? मोर अनुपस्ठिटिमे यि उज्जर लस्गर चिज यहाँ बिस्टारामें कैसिक ? आखिर कैसिक ?

बाट समझसे बाहेर रहे । अगर उ मनैंया रंगेहाँठ लाग जाइट टे मैं साइट ओठ्ठेहे गेंर डेटुँ । बुह्रिया चाय बनाके नानल । मन टे लागल, टट्ले चाय ओकर मुँहेम उलिड डिउँ ? का मन हुइल, चाय पकर लेलुँ, सुरुप–सुरुप पिए लग्लुँ । चायक स्वाड पटा नै चलल् । गुरि फिक्कल, टाटुल–जुर कौनो पटा नै चलल् । मैं छाइहे हेर्लुं । लागल यहो मोर जावन नै हो काहुन् । मोर अनुपस्ठिटिमें अउइया उहे मनैयक हुइहिस ।

छुटियाहा हुइल पैन्ट टंगा डेलुँ । आउर लुग्रा फेन । लुंगि पहिरलुँ । जगेरा झुलवा घालके खेटवा ओर डगर नमैलुँ । बुह्रिया घारिम गोबर काह्रटेहे, गझिन्के आँख मिस–मिस ओकर ढोटि हेर्लुँ । लेउ कहुँ कहुँ उहे लस्गरवा डाग अस, लंहगम फेन । संका नै रैह गैल, जरुर मोर डिलके रानि तिलरानी डोसर रज्वा खोज राखल ।

कहाँ–कहाँ सिमाना घुम्लुँ, पट्टा नै चलल् । बरे डुर निकर गैलुँ कि जब्डहान लौँरा खेटवम ढान काटट् बिल्गाइल । ‘डेवारि माने आगैलो भाटु ?’ अस्टे पुँछ्टि उ महिं ढोक लागल । मैं अक्के सब्ड ‘हाँ’ कलुँ ओ आउर विना वार्टालाप करल ओठ्ठेसे फिरिक्के घुम गैलुँ ।

जब्डहान लौंरा लक्का जवान । सायड गेरामें पह्रठ । मोर जन्निहे ‘डिडि’ नाँट लगैले बा । ओकर अपन डिडि–बहिनि नै हुइस् । डेवारिम मोर जन्निसे टिका लगाइठ । संका करल, पापि मन । कि इहे लौंरा आइल रहे राटके ? नै टे अट्रा अनगुट्टि कैसिक ढान काटे पुग गैल ? मैं अपने उप्पर झोँक फेन उठल । टब्बेहे खटियक टरे का करे नै हेर्लुँ ? सायड मनैंया नुकल रहे कि ? नै टे बुह्रिया डवार खोल्नम टेम का करे लगाइल ?

***

आझु भाइटिका जब्डहान लौंरा टिका लगाइ आ गैल । मन कहल– टुरि घर भँरवा । डिडि नाँट लगैठे ओ राटके रानि बनैठे ? ढोंगि सारे । मन टे लागल उ लौंराहे हाँठ पकरके घरसे निकार डिउँ । मने मन बाँढके रैह गैलुँ ।

टिका लटरपटर ओराइल । ऐसेबेर सँगे बैठके डेवारि मन्ना सग्गे भइवा नै आइल । ओइसिन टे मोर डिडि बहिनि नै हुइट । ओहे ओर्से डाडु भाइ संगे बैठ्के टिका डिडि बहिनिन्से लगैना फेन सवाल नै रहे । एक गिलास डारु सोंइट पर्लुं । जनेवा कहल,‘ऐसिन टेज डारु ओइसिक टे नै पिना हो एक्फाले । नै हेरो गठ्ठुक लाग गैल । लेउ पानि पिओ ।’

मन टे लागटेहे । अपन गोसिन्याहे पि लिउँ । जिट्टि लिल लिउँ । संका लागल कि अपन भौजिकमें सुट्ना मोरे भइवा हो सारक । नै टे अङनम ठाँटसे घाम टापटा । सँगे बैठ्के का करे नै खाइ आइठो ? यइने डेउरा भौजि मिलल् हुइट पक्के । तिलरानी नै टे डेउरिन्या नन्ना बाट कहटि किल का करे बिरोढ करठ ? डस्यम आइल बेला फेन टे कले रहुँ कि असौं भइवक भोज कै डि । जागिर खैना, घर हेर्ना टोर फेन कर्रा बा । मने गोसिन्या कले रहे, ‘पह्रटि बटाँ भैया, पहे्र डेउ । माउँ फेन टे बुह्रैलो पर काम ढन्डा अपन ओर्से कै डेठि । कहाँ पह्राइ बिगारे जैबो ?’

मैं फेन टे भोज कैके टौन पह्रटि रलुँ, जागिरो खैलुँ । आखिर बुह्रिया का करे डेउरिन्या नानक मन नै करल ? भैयासे पुछ्लुँ टे उहो गडहा कले रहे, ‘टोर नन्हे छोट ओट जागिर भेटैम टब भोज करम डाडु ।’ ओकर यहाँ काम चल्टि रहिस टे भोज करक मन करि बक्टेंरवा सारक ।

डोसर गिलास फेन सोंट पर्लुं ओ कोन्टिम सुटे चला गैलुँ । बुह्रिया प्रमान नस्ट कै रख्ले रहे । टन्ना, सिरहन्नि, गुडरिक खोल, मोर पैन्ट, सट सब ढो रख्ले रहे । मजासे निंड परल नै रहे कि मिटवा संघरिया डेवारि माने आ पुग्लस् । डुरेसे गोहराइ लागल,‘ओ मिटौ… मिटौ ?’ मै सुनके फेन नै सुने अस कर्लु ।

महिं एकठो संका बा । मोर पापि मन, उ डिन टुँ आइल रहो । छाइ राटिए खेलक उठ् गैल रहे । खेलौना माँगे । कौनो खेलौना नै रहे । टुहिन चिठि उठि पठैना कहिके गम नन्ले रहुँ, खामेम चप्ट्वाइक टन । उहे खेलाइ डै डेलुँ टौन खै कैसिक खोल लेहल । सारा विस्टारामें अँरवा डेले रहे । मोर लहंगम ओहगम लट्पटा गैल रहे ।

बुह्रियक बोल आइल, ‘टोहार मिटवा बासि लगाके सुटल बटाँ । ठकाइल बटाँ, सम्ठाइ डेउ । आउ बेन डेवारि माने ।’ मन कहल, ‘हो ना हो, इहे फटरंगवा मिटवा टे नै अपन मिटिन्यक गोन्या सुँघठ ? नै टे मोरे सामने मोर गोसिन्यक् पिंठ सुहरा–सुहरा का करे चलठ ? गडहा सारे । इहे बैमान हुइ ।’

साइड अपन विस्वासघाटि जनेवक मैं आउर फेन गोचा अङरेइटुँ लकिन अक्के घरि कचसे निंडा गैलुँ । भुख्ले पेट मनके लाग गैल रहे । सन्झा एकफाले चार बजे ओर उठ्लुँ । मिटवक घर गैलुँ । मिटवा नै रहे । ‘सारक डगावाज महिंसे आँख मिलाइ सेकि टब टे ? भेट करक डरे भग्ले भग्ले बा ।’ मन अस्टे बर्बराइल । मिट्वक घर कसके पिलुँ । घरे आके बेरि फेन नैखाके पठरिम आङ जोंटा लेलुँ ।

अस्टे रात ३ बजे ओर निंड खुलल हुइ । घट घट पानि पिलुँ । नाइट बल्बमें आघेपाछे रानि अस डेख्ना जनेवक अनुहार कानि अस डेख्लुँ । मन टे लागल कि बनचेरिले गेंर डिउँ । ना रहे बाँस, ना बजे बसिया । बिहानसम कट्रा कस्ट झेल्के कटैलुँ, पटा नै चलल् । अनगुट्टि नाउँभरिक कलवा खैलुँ । डुठाइ हस किल कर्लुं । बिडा नै हो कैहके झोलम लुग्रा ढर्लु ओ सडरमुकाम घुम गैलुँ ।

छुट्कि राप्ती लडियम पर्समें रहल जनेवक फोटु एकचो ठुकके चिंठके पुहा डेलुँ । अस्टक असलि जनेवा फेन बाढेम पुह जाए कना कामना कर्लुं । ओठ्ठेसे सुरु हुइल मोर खराब डिन । बरे मुस्किलसे ड्युटि जाँउ । नै पिलक डिन नै रहे । छुट्टिक डिन सक्करहिसे पिए भिंर जाउँ । घरेसे अफिसमें फोन आए टे ‘बाहिर जानु भा छ’ कैह डेउ कहुँ । डेरा फेन औरे ठाउँ सार रख्ले रहुँ । जनम–जनमसे साठ डेना कोह्रिन्यक वाचा कसम कहाँ गैलिस् ? यि जन्निक् बेउहार भगवान फेन बुझे नै सेक्लाँ टे मैं छोट मनैं का बुझे सेकम ? मन टे लागे डोसर भोज कै लिउँ । डोसर मन कहे– उहो ढोखेबाज निकरि टे का कैबे ?

घरसे कनेक्सन टुट्लक पुरे छौ महिना बिट सेक्ले रहे । मनैं जँड्याहा खरडार नाउँ ढै डेले रहिंट । जिन्गि ओस्टे पिके माटिमे हालि मिला डेना सोंच डिनडिने बल्गर हुइटि जाइटेहे । छौ मैन्हक बाड एकठो पुरान खाम मोर हाँठ परल । जौन खाम मोरमें प्रान भरडेहल । अफिसके पिउना जब–जब मोर टेबुलमें आए, मोर टेबुल खालि डेखे । उहे बिचेम ओकर बाबा मुलक ओर्से किरिया विडा लेके पहाड घर चलडेले रहे । पुरे डेढ महिनक वाड उ घरेसे आइल । चिठ्ठि ओकरसंगे पहाड पहुनि खाइ गैल रहे । चिठ्ठि पह्रके मोर आँखिमसे आँसक सैलाफ बहे लागल । मैं अपनहे फेन तिलरानीक आघे बरवार अपराढि सम्झे लग्लुँ ।

फागुन १५


मोर डिलके राजा

सेवा ढोग,

अपने टे एकाएक गायव हो गैलि, गिडारिन्के सिंघ गायब हुइ अस । माघेम आके गोटिगाटा घरबेउहार मिलैबि कना अस्रा रहे, नै अइलि ।

यि बिचेम यहोंर बहुट उठलपुठल हुइल । अपनेनसे कैयो बार फोन सम्पर्क कर्ना कोसिस कै गैल, सब बेकार हुइल । ओहे ओर्से चिठि लिखे परटा । पटा बा कि नै, अपनेक मिटवा इन्डिया भाग गैल बटाँ । कारन सुन्बि टे हाँसि लागि, जनेवा फेन डोसे्र छाइ पाइल कैहके भुँसियाके चल गैल बटाँ । जब्डाहन लौंरा जन्नि उह्रारके नान राखल । भाटु गरियइहि कैहके डरैटि रहठ ।

टोहार भइवा डेवारि मन्टि कि बहुट विमार पर्लां । टुँ आइल रहो टे फेन डवाइ खैटि रहिंट । कोरु टेलार, जाँड डारु खाइ नै बनिन् । उहे ओर्से टोहार संगे डेवारिम फेन नै बैठलाँ । डाडु डुख मानल हुइहिं कहिके मोर ठेन कहटिंहिट । डक्टरवा यहाँ नै हुइ कहल टे नेपालगंज लैजाइ परल । पुरा डुइ अठ्वार अस्पटाल भराना हुइलाँ । जन्डिस हो गैल रहिन् । मैं स्कुलसे छुट्टि लेके अस्पटाल बैठ्लुँ । फेन डोस्रे छुट्टि बेर–बेर लेहे नै बन्लक ओर्से टुहिन भेट फेन करे नै आइ सेक्लुँ । टुँ टे आइ सेक्टो । मने खै का करे टुँ निस्ठुरि बन गैल बटो ।

महिं एकठो संका बा । मोर पापि मन, उ डिन टुँ आइल रहो । छाइ राटिए खेलक उठ् गैल रहे । खेलौना माँगे । कौनो खेलौना नै रहे । टुहिन चिठि उठि पठैना कहिके गम नन्ले रहुँ, खामेम चप्ट्वाइक टन । उहे खेलाइ डै डेलुँ टौन खै कैसिक खोल लेहल । सारा विस्टारामें अँरवा डेले रहे । मोर लहंगम ओहगम लट्पटा गैल रहे । टुँ विस्टारामें बैठ्लो टे टोहार पैन्टरिम फेन लाग गैल । टुँ चाय पिके बाहेर गैलो टे टोहर फेरल पैन्टरिम गम लागल डेख्लुँ टे हाँसि लागल । जम्मे टन्ना, गुडरिक खोल सक्कु ढोइलुँ । साइड टुँ उ गमहे ठारुन्के सुटे बेर निकरना चिज समझलो कि का । ओ समझ लेहल हुइबो मैं सायड कौनो गोचासे सुटल रहल हुइम ? छिः हा ! अहोइ छाइक बाबा यि मोर संका किल होवइ । सायड टुँ काजमें औरे ठाउँ फेन जाइ सेक्ठो । घरे खबर करे नै भ्याइल हुइबो । ढेर का लिखुँ । लावा बरसमें जरुर अइहो प्यारा ।

हाँ, छाइक लग् खेलौना जरुर नन्हो । आजकल गोटिगाटा नेंगठ । डाइ फेन बर्कना घर बिस्रा डर्लस कठि । नै अइना हुइ टे चिठि जरुर पठैहो । अपन स्वास्ठ्यके ख्याल करहो । टोहार लम्मा आयुके कामना करुइया ।

उहे जिवनसंगिनि
टोेहार तिलरानी

जैटि जैटिः चिठि लिख्ना बान छुट गैलक ओर्से कहुँ अपने कहुँ टुँ सम्बोढन कर्ले बटुँ । छ्यमा गुना माफ करहो । हाँ एकठो खबर टे जनैहिक बिसरैलुँ, उहे ओर्से फेन डटपेन रगरटुँ । टोहार भइवा भोज कैना ‘हामि’ भर रख्लाँ । अस्पटालेम महिहे सेवा करट डेख्के डिस्चार्ज हुइटि साइट कसम खैलाँ, ‘भौजि जवान डेवरवक गुह मुँट सहेर लेलो लाज लागल । मैं चिक्कन हुइम टे भोज कर्ना मन बनैले बटुँ । एकठो संगे पह्रना लवन्डिहे मन फेन परैले बटुँ । डाडु अइहिं टे डुरेसे बहुरिया डेखैना बिचार बा ।’

मैं खेलवाड कर्लुं, ‘जन्निसे जिन्गि टे टोहार कट्ना बा । डाडुहे बहुरिया डेखाके का कर्बो मन बा टे अपन डाडुक नन्हे राटिए माँगे चला जाउ ।’ डेवरवा का कहलाँ पटा बा,‘डाडु भौजि टे मोर डाइ बाबा सरह हुँइट । ओइनके इजाजट विना मैं कौनो काम ठोरो करम ना भौजि ।’ लावा बरसमे मोर मुँह नै हेरे अइलेसे फेन अपन भइवा ओ हुइना वाला बहुरियक खुसिके लिए जरुर अइहो ।

टोहार तिलरानी

चिठि पह्रके मै खुसिसे पागल हो गैलुँ । लावा बरस अइना डुइय डिन बाँकि रहे । बह्रल डाह्रि मोछ बनैलुँ । घर भरिक मनैन् लग लावा लुग्रा लेलुँ । कट्रा पापि सोंचाइ रहे मोर । केकर–केकर उपर संका नै कैलुँ । वास्टवमें संका लंका जराइठ कना सट्य हो । डुइ अठ्वारके लम्मा विडा भरके घरे जैना बस पकरलुँ । आझुक याट्रा बहुट लम्मा लागल ।

घरे पुग्लुँ । गोसिन्या गोडामें ढोक लागल । अपन सीताहस गोसिन्यक उपर संका कर्ना यि पापि मनहे कोन्टिमसे डुर पठैलुँ । जन्निक ओ छाइक बिच्चेमे आझ ढेर डिन पर्से सुख निंड सुट्लुँ । भिन्सारे फेन मन चन्चल नै हुइल । टन्नामें डाग लगाइक मन नै लागल ।

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