थारु राष्ट्रिय दैनिक
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[ थारु सम्बत ०६ कुँवार २६५०, मंगर ]
[ वि.सं ६ आश्विन २०८३, मंगलवार ]
[ 22 Sep 2026, Tuesday ]

परम्परागत सिपसे आत्मनिर्भर चुल्हुवा

पहुरा | ६ आश्विन २०८३, मंगलवार
परम्परागत सिपसे आत्मनिर्भर चुल्हुवा

पहुरा समाचारदाता
धनगढी, ६ कुँवार । कैलालीके कैलारी गाउँपालिका–१ बिसनपुरके ६१ वर्षीय चुल्हुवा चौधरीके घर आँजरपाँजर बाँसघारी रहल बा ।

घरायसी कामकाजमे प्रयोगके लाग बाँस लगाइल चौधरी अब्बे बाँससे आम्दानी करे लागल बटै । बाबाबुडुसे सिखाइल परम्परागत सिप उपयोग कैके उहाँ बाँसक सामग्रीसे आम्दानी करे लागल बटै ।

उहाँ बाँसक छिटुवा (डालो) ओ डिलिया (मच्छी ढर्ना भाँडा) बनाके बिक्रीवितरण करटी रहल बटै । चौधरी कहलै,“बाँस अपने घरमे बा । फुर्सटके समयमे ठोर ठोर कमाइ कैटी रहल बटु ।” बाँसके कम्चीसे छिटुवा, डिलिया बनैना पोख्त चौधरी एक महिनामे १० ठो छिटुवा ओ २० ठोसम डिलिया बिन्ना करल बटै ।

आपन बनाइल बाँसक उ सामग्रीहे उहाँ अपने गाउँसे लेके आसपास रहल मनाउँ, मझरा, हसुलिया, पवेरा, मनिकापुरसे लेके भर्री लगायतके गाउँसम नेंगके उहाँ आपन सामग्री बिक्री कैटी आइल बटै ।

“आज सकारे किल दुई हजार रुपियाँके सामग्री बिक्री करसेकल बटु”, उहाँ कहलै । चौधरी प्रति छिटुवा पाँच सय ओ डिलिया दुई सय रुपियाँके दरसे बिक्री कैटी आइल बटै । मच्छीनके पारखी थारु समुदायके मनै डिलियामे मच्छी ढर्ना करठै । ओस्टके, टिनाटावनसे लेके घाँस, चपरी काठी छिटुवामे ढारके बोक्ना करठै ।

इ सामग्री गतविगतसे नै थारु समुदायमे उपयोग हुइटी आइल बा । समुदायके माग अनुसार अपने छिटुवा, डिलिया बिक्री कैके कमाइलपाछे घर गुजारा कैना सहज हुइल चौधरीके कहाइ रहल बा ।

 

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