थारु राष्ट्रिय दैनिक
भाषा, संस्कृति ओ समाचारमूलक पत्रिका
[ थारु सम्बत २८ सावन २६५०, बिफे ]
[ वि.सं २८ श्रावण २०८३, बिहीबार ]
[ 13 Aug 2026, Thursday ]

साहित्य

बाध्यताके सिकार

बाध्यताके सिकार

पात्र हुक्र : डिलसिंह : जिम्डर्वा बिस्न्या : कमैया( डिलसिंहके पुरान कमैया ) चुल्ही : बिस्नेक जन्नी भुन्टी : विस्नेक छाई रामु : बिस्नेक छावा स्थान : बिस्नेक गाउँ ओ चौभानके आसपास दृश्य –१ (बिस्नेक अङ्गनाम बैठ्ख मोछ पक्ला जिम्डरवा डिलसिंह
भस्कुरान भ्वाज

भस्कुरान भ्वाज

फग्नक महिना रुख्वा बरिख्वाम लौव लौझा डँर्या पट्टेम लट्पटाइल बौंरा सुगुना ढुल्ला खेल्टि फुलवारसे मगमग सुवास लेक सिट्टर बयाल घर घर अइलक सन्डेसमुलक गिटले गाउँ चैनार पर्टि रह । माघ–डेवानिम स्वाचल सोचह आघ बह्रैना समय सेम्रक भुवाअस
मुक्तक

मुक्तक

कुछ लिखु कैके कलम उठैठु कलम रूक जाइट् ।मनके पोक्री डिलसे खोलु कठु मनमे नुक जाइट् ।। बहुट बा, इच्छा चाहना यी जिन्गीम् कुछ करना मनमै सपना डेख्टी रहि जिठु बहुट कुछ झुक जाइट् ।। टीकापुर, कैलाली
लाल मोरै

लाल मोरै

लाल मोरै कसिन रहठ ? कट्रा भारी रहठ ? उज्जर मोरै असक लम्मा रहठ कि सलगम असक गुल्यार ? लाल मोरैक पट्या कसिन रहठुइहिस ? हरेर रहठुइहिस कि लाल जो रहठुइहिस ? बीरबहादुर क ठे लाल मोरैक बारेम छन्डि छन्डिक हजारौ सबाल बाटिन । बाबा लाल मोरै लेह गैलक
विस्वासघात

विस्वासघात

ढेर पैसा कमाके अपन घर परिवार हे खुसी से जिन्दगी बिटैम कहिके रमेश मलेसिया गैल रहठ् । बिदेशमे नेंट के मजा सुबिढा हुइलेक ओर्से रमेश रात दिन नेंट मे झुलल रहठ । बठिनियन् संघरिया बनैना चौबिसो घन्टा गफ कर्ना रमेशके बानी दिन दिने बडल्टी
दुई मुक्तक

दुई मुक्तक

सुनगाभा काहे, भौंरा हे मारठ ।मैया करुयनके, जिन्गी बिगारठ ।।अप्नेहे लोभ्वाइठ, जग्मग्रार बनके,आपनसँग अप्नेहे, खुद काजे हारठ ।। मुटुक बिच्चे आँधी चलठ, काहे टु मै अचम्मके ।बिना आगिक् दिल जरठ, काहे टु मै अचम्मके ।।ना टे सेक्नु कहे कब्बु,
जोखुक् जिन्गी

जोखुक् जिन्गी

कौनो प्राणी इ धरतीम पौली टेक्लक बाद यमराजके यात्रामे सरिक हुइना निश्चित रहठ । मने बाट अट्रे हो कि कोइ कर्रक कोइ ढिरेक । इ सक्कु बाट जन्टी जन्टी, बुझ्टी बुझ्टी एक्काइसौं शताब्दीमे विश्वबह्माण्डके इ चेतनशील उपनाउँके पात्र ऐस, आराम,
चिपा रो छोट्का

चिपा रो छोट्का

भुख लागल मै भात मंग्नु,टुँ म्वार पिठिम धाप लगाकबरा प्यारसे कलोचिपा रो छोट्का ।म्वार ठे काम कर्ना पख्रा बा,मै जमिन मंग्नु टुहिन दया लागलअढ्या लगाइक लाग ठन्चे डेलोमालिक टुँ खुद रहो, मै कमैयाओ बरा प्यारसे कलोचिपा रो छोट्का ।मै बेराम
डाडु का बा विडेसमे ?

डाडु का बा विडेसमे ?

डाडु,टु यहाँसे गैलेपरडाइ जहिया फेनचिन्टा लेटि रठिटोहार उ हटारमेलेलक निर्नयलेफुरे हम्रहिनअक्को मजा लागल नै होहमेर टुहिन रोक्नालाख कोसिक कैलिमने खै टुँ का करेविडेस पलायन हुइनासोंच बनैलोडाडु, का टुँ उहाँचैनसे बैठे पैले बटो ?बिल्कुल
गजलः दरबार तातल बा

गजलः दरबार तातल बा

आजकाल सिंह बैस्ना दरबार तातल बालालची पार्टी पङ्क्तिके घरबार तालल बा । लगाम बिनाके कार्यकर्तनके बाहवाहीमनाक निरहल नेताके सरदार तातल बा । चारुओर असन्तुष्ति ओ विरोधकेल देख्जाइठसंवैधानिक असंवैधानिक द्वन्द्वले अखबार तातल बा । बेमौसमी