पृष्ठभूमि ६० के दशक पाछे चर्चाके रुपमे अइटी रहल शब्द हो, जय गुर्बाबा । हरेक यूवा वर्गमे खास करके यूवा साहित्यकार तथा लेखक वर्गमे यी शब्द एकदम मुखारित हुइल बा । किहिनहे अभिवादन करे परलमे जय गुर्बाबा कना करजाइठ । ६० के दशक से आघे थारू
फागुन आइठ टो भोज सम्झबो । भोज कहटी कि लगनके बाट उठे लागठ । कोइ कहे लागठ, असौं लगन नाइ हो । कोइ कहे लागठ, लगन बा मने बरा कम डिन बा । फागुनके लग्गे बस अस्टे अस्टे बाट उठा करठ । पहिलेक चलन फरक रहे । फागुन अइटी कि थारु बस्ती चैनार । न लगन न सगन ।
अधिकांश पर्सागढीके बारे जन्ले हुइबी । मने नेपालके भूभाग ब्रिटिस सरकारसे कब्जा करना क्रममे नेपाली अंग्रेजहे पराजय करना टमान गढीमध्येके एक हो पर्सागढी । यिहिनहे और विस्तृतरुपमे कलेसे वि.सं. १८७१ मे नेपाल सरकार ओ भारतके तत्कालीन
ओंरवा लेहेबेर नेपाल भर थारु पत्रकार कठेक बटाँ ? महि लागठ, यकर ‘लेटेस्ट’ यकिन तथ्यांक थारु पत्रकार संघ नेपालके ठेन नै हुइस । थारु पत्रकारन्के यकिन संख्या ओ कौन थारु पत्रकार खास कैके अपन थारु मातृभासम पत्रकारिता करटि बटा ? थारु पत्रकार
आजसे १७ वर्ष पहिल रेडियो कार्यक्रमक लाग प्रश्न पुछबेर महि थाहा नि रह कि यि कार्यक्रम रेडियो प्याकेजि· हो कैक । मनै पहर्क जन्ठ कि ट पर्क कठ । रेडियो पत्रकारिता ना मै पह्रल रनहु ना मै बनैना ठाउँ डेख्ल रनहुँ । उ समयम रेडियो नेपाल काठमाडौं
मनै मुअक ते जर्मलक नै हो, बेन जियक ते जर्मलक हो । प्याट केल पालक ते जिना त संकिर्ण व घिनलक्टीक विचार हो । ऐसिन घिन लक्टीक विचारह ठाउँ देलसे मनै उन्नतिम नाही वेन बजहन्ने परजाइ । जिना त एकथो कुकुर फे जियल रहथ । घिन लक्टीकसे घिन लक्टीक
वि.सं. १८२५ मे जब राजा पृथ्वीनारायण शाह काठमाडौँ उपट्यका जिटके नेपाल राज्यक स्ठापना कैलाँ, टबसे राज्य संचालनमे निजामति प्र्रशासनके भुमिका रलेसे फेन खास कैके वि.सं. २००७ सालमे जब राणान्के जहाँनिया पारिवारिक शासन ओराइल टब राज्य संचालनमे