थारु लोकसँस्कृति यी पङ्क्तिकारहे अत्रा मोहनी काहे लगाइठ कि यी वाहेक और कुछ चिजके ख्याल नैआइठ ! हरपल यी सम्मोहित करटिरहठ । यी पङ्क्तिकारके घरके पुस्तकालयमे थारु कल्याण कारिणी केन्द्रीय सभाके प्रकाशन बा “थारु संस्कृति” ०६२ बैशाख
हरेक १० वर्षमे हुइना जनगणना यी वर्ष २०७८ मे फेन ‘मेरो गणना, मेरो सहभागिता’ नाराके साथ यिह भदौ ३० से असोज १८ गतेसम तथ्यांक संकलन हुइटि बा । राष्ट्रिय जनगणनाके लाग केन्द्रीय तथ्यांक विभागसे पूर्वतयारीके साथ लगलेसे फेन कोरोनाके महामारीके
बिसय प्रवेसः थारु गिटके प्रकासिट पोस्टाके इटिहास बिल्टैना हो कलेसे थारू कल्याणकारिणी सभा जिल्ला समिति दाङ २०२४ सालओर ‘सखिया गिट’के प्रकासन कैके लोकसाहित्यहे लावा डगर डेखाइल । ओस्टक पुरुबओर २०२५ सालमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह
मानव सभ्यताक इतिहास वक्ररेखा पार कैक बनठ । हरेक युगमा उन्नत संस्कार ओ संस्कृति बनकलाग उ ब्यालक मानव समुदाय विद्रोह कर्ठ, सचेत ओ युगद्रष्टाहुक्र अगुवाइ कैक समाज रुपान्तरण कर्ठ । वर्गीय समाजम वर्र्गीय चेतनाले ओतप्रोत हुइल क्रान्तिकारीहुक्र
थारू जात नेपालके जनजाति अन्तर्गत परठ । यी जाति जबफेन राज्य सत्तासे अपहेलित तथा अपेक्षित जात हो । तथापि ईतिहासके टमान कालखण्डमे हुइल राजनीतिक आन्दोलन ओ यिहिनसे नानल परिवर्तनसंगे यी समसदाय अपन भाषा, संस्कृति, कला, साहित्य, गीत, संगीत
२०१५ मार्च ८, अन्तर्राष्ट्रिय नारी दिवसमे दाङसे सहभागिता हुइ पाटनके कृष्ण मन्दिर परिसरमे बिहन्ने आपुग्नु । नेपालके टमान जिल्लासे टमान जाति, धर्म, संस्कृति किल नैहुके कलाके टमान विधाके हम्रे सहत्तरी जाने व्यक्तिहुक्रे एक ठाउँमे
विषय प्रवेशः चाडपर्व (टरटिहुवार) मनैन्हे चौकस ओ चम्पन बनाइठ । हरेक जाति समुदायके अपन मौलिक तौरतरिकासे मन्ना टमान चाडपर्व रहठ । थारू एक अलग पहिचान डेना मेरिक अपन भाषा संस्कृति एवम् सामाजिक रीतिरिवाज रहल जात हो । थारू जात अन्य जातहुकन